भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति : '17-18

भारत एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। प्रस्तुत है हमारा विस्तृत विश्लेषण

इतिहास का चक्र चलता जा रहा है



पिछले कुछ महीने काफी उथल-पुथल भरे, अप्रत्याशित और रोमांचक रहे हैं। विश्व के विभिन्न देशों में, दक्षिण एशिया में और भारत के भीतर घटित घटनाक्रम स्वयं विश्व व्यवस्था के पुनर्गठन की ओर इशारा करते हैं। आज जब प्रधानमंत्री मोदी की भाजपा वर्तमान राजनीतिक क्षण पर एक निर्णायक प्रभाव स्थापित कर रही है, हम उन सभी मामलों पर विचार करेंगे जो भारत के साथ ही विश्व के लिए महत्वपूर्ण हैं। गंभीर विद्यार्थियों के लिए इस बोधि के बाद हमने गहरे अध्ययन के लिए व्यापक बोधि लिंक प्रदान किये हैं जिनमें यहाँ उल्लेख किये गए विभिन्न विषयों के दृश्य और श्राव्य संसाधन उपलब्ध हैं। 


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भारत - १३५ करोड़ लोगों का देश - के आज के सबसे प्रभावशाली राजनेता


ऐसे लगभग दस घटनाक्रमों की ओर तत्काल इशारा किया जा सकता है, जिनमें से प्रत्येक विद्यमान व्यवस्था को गहरे से प्रभावित करने की क्षमता रखता है। क्यों? (1) अब हमारे पास विश्व का सबसे बड़ा अनिवासी भारतीयों का समूह है, (2) आज हम पहले से कहीं अधिक विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत हैं, (3) आज हम राजनीतिक परिवर्तन के एक निश्चित परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं, और (4) हमारी वास्तविकता का एक बड़ा हिस्सा इन चुनौतियों द्वारा परिभाषित हो रहा है। 





विश्व की स्थिति – 2017-18 



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    • १. विश्व परिदृश्य पर ट्रम्प का आगमन 
      • पूंजीवाद, उदारवाद और खुलेपन के प्रतीक चिन्ह – अमेरिका – में तथाकथित “गैर उदारवादी” मूल्यों और राजनीति और का उदय और उत्थान विश्व की कार्यप्रणाली में एक निर्णायक बदलाव लाया है। यदि स्थापित प्रतिष्ठान, उदारवादियों और मीडिया  द्वारा पीछे खींचने के प्रयासों के बावजूद ट्रम्प अपने वादों पर बने रहते हैं तो हम उस 'पैक्स अमेरिकाना' में एक विशाल परिवर्तन की उम्मीद कर सकते हैं जिसका अभी तक विश्व अभ्यस्त रहा है। दावोस पुरुष को अलविदा। इतिहास के अंत के पश्चात के चरण का स्वागत।
          [ Running Updates on Donald Trump related news ]
    • २. ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से प्रस्थान 
      • प्रारंभ में एक असंबद्ध प्रतीत हुए घटनाक्रम में ब्रिटिश लोगों ने निर्णय किया (हालाँकि इसकी दो घटक इकाइयों ने इससे अलग हटकर विचार किया) कि उनके लिए बेहतर है कि वे विश्व में स्वयं को एक पूर्ण संप्रभु देश रखें, बजाय इसके कि वे सभी जगह वे स्वयं को एक ऐसे यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करें जिसमें उनकी संप्रभुता के साथ समझौता हुआ है। अतः यूरोप को अलविदा और ब्रेक्सिट का स्वागत। श्रम के मुक्त प्रवाह, जो बड़े निगमों (कॉर्पोरेट्स) के लंदन के प्रति लगाव का एक महत्वपूर्ण कारण था, पर इसका जो प्रभाव होगा, और जो प्रभाव दिखने भी लगा है, यह निर्णायक होगा। 
    • ३. भारत का आंतरिक राजनीतिक पुनर्गठन 
      • विश्व के किसी भी अन्य देश के विपरीत भारत एक पूरी तरह से भिन्न देश है। आकार की दृष्टि से केवल चीन ही इसका मुकाबला कर सकता है (दोनों देशों में लगभग १. ३ अरब लोग हैं) । परंतु भारत एक बेहद कठिन लोकतंत्र है जो किसी भी विद्यमान शासन को अत्यंत अप्रत्याशित ढंग से उखाड़ कर फेंक सकता है, जो चीन की व्यवस्था से पूरी तरंग भिन्न है जो एक अखंड राज्य है जिसे न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जानकारी है और न ही लोकतांत्रिक परंपराओं की। मार्च २०१७ में आये विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारत की आंतरिक राजनीति को झकझोर कर रख दिया है। केंद्र (संघीय या वास्तव में अर्ध-संघीय) सरकार के लिए इसका प्रभाव न केवल २०१९ के राष्ट्रीय चुनावों में दिखेगा बल्कि इसके बाद में भी होगा। भारत के रक्षा और सैन्य दृष्टिकोण और विश्व व्यापार और विदेशी मामलों के प्रति भारत के दृष्टिकोण को एक नया महत्त्व प्राप्त होगा। संभवतः पुनः ऊर्जा से परिपूर्ण मोदी सिद्धांत का समय आ रहा है?
    • ४. दक्षिण एशिया और एशिया पर प्रभुत्व स्थापित करने के चीन के प्रयास 
      • चीन संपूर्ण एशिया में अपना भौगोलिक विस्तार करने के अथक प्रयास कर रहा है, जिसके तहत वह ऐसे प्रदेश में भी निर्माण कार्य कर रहा है जो भारत के प्रदेश से होकर गुजरता है और जिसपर पाकिस्तान द्वारा अनधिकृत रूप से कब्ज़ा किया हुआ है। अपने एक पट्टा एक सड़क (One Belt One Road - OBOR) परिसंपत्तियों को आगे बढाने के मामले में वे भारत की भावनाओं के प्रति कोई सम्मान और कोई समझौतावादी दृष्टिकोण नहीं दिखाते हैं। यदि सभी चर वस्तुओं, निवेशों, वक्तव्यों और गतिरोधों को एक दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में एक बड़ा संघर्ष होना अपरिहार्य प्रतीत होता है। चीन तब तक शांति से नहीं बैठेगा जब तक वह इसपर कब्ज़ा न कर ले, और भारत किसी भी कीमत पर उसे ऐसा करने नहीं देगा। आगे आने वाले कुछ कठिन समय के लिए स्वयं को तैयार कर लें।
    • ५.  विश्व भर में स्थानीयता और राष्ट्रवाद का भारी उत्थान
      • सीमाविहीन विश्व, या सीमाविहीन होने का प्रयास करने वाले विश्व के सुनहरे वर्ष अंततः समाप्त हो चुके हैं। कम से कम वह भ्रम तो समाप्त हो ही गया है। विश्व कभी भी सच्चे अर्थों में सीमाविहीन नहीं बन पाया, परंतु संस्थागत तंत्र और पैक्स अमेरिकाना ने हमें ऐसा मानने के लिए कहा। यह अब पूरी तरह से और सही मायनों में समाप्त हो गया है। सर्वोत्कृष्ट 'दावोस पुरुष' खो गया है, कहीं कार्बन उत्सर्जन के काले, घने धुंए में उड़ गया है, जिसने वैश्विक उष्मन के युग की अपरिवर्तनीय घटनाओं का निर्माण किया था (जिसके बारे में ट्रम्प का मानना  है कि यह चीन का एक षडयंत्र है)। 'इतिहास का अंत' समाप्त हो चुका है और एक नए इतिहास का जन्म हुआ है। क्षमा करें फ्रांसिस फुकुयामा, आप अत्यंत उत्कृष्ट ढंग से गलत थे। स्थानीयता की लहरें और इससे उठने वाली चिंगारियां अनपेक्षित स्थानों तक फ़ैल रही हैं – हॉलैंड और तुर्की के बीच संघर्ष इसका एक उदाहरण है जो लोगों को इस बात के प्रति आश्वस्त कर देगा कि व्यवस्था का पुराना तंत्र वास्तव में समाप्त हो चुका है। लगभग सभी जगह प्रवासी लोगों पर अनिश्चितताओं के बादल मंडरा रहे हैं – भारत के लिए यह बुरी खबर है जिसके पास अभी विश्व का सबसे बड़ा अनिवासी समूह है!
    • ६. विवैश्विकरण की मांग 
      • इन सभी घटनाक्रमों की अपरिहार्य परिणति है विश्व भर में उठने वाली विवैश्विकरण की मांग जिससे  विश्व को एकीकृत करने वाले विश्व व्यापार संगठन (WTO) की ईमारत को ही खतरा पैदा हो गया है जिसने एक ऐसे विश्व का वादा किया था जो विवादों के निष्पक्ष न्याय-निर्णय पर आधारित बहुपक्षीय व्यापार का सम्मान करता था। आश्चर्यजनक रूप से विश्व के पहला सच्चा वैश्विक व्यापार समझौता – व्यापार सुगमता अनुबंध (TFA) – इस सब के बीच होता है। अब हम दावोस के विश्व आर्थिक मंच पर एक गैर-लोकतांत्रिक देश द्वारा मुक्त व्यापार और खुली सीमाओं के गुणों का बखान करने का चमत्कारपूर्ण दृश्य देखते हैं! यदि अमेरिका पीछे हटता है तो चीन विश्व का नेतृत्व करने को उत्सुक है। विश्व के स्वतंत्र अभिव्यक्ति, खुलेपन और राज्य शक्ति की सीमाओं पर विश्वास करने वाले नागरिकों के लिए इससे अधिक भयानक संभावना इससे पूर्व कभी नहीं थी। 
    • ७. आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा मुद्रा प्रयोग 
      • ८ नवम्बर २०१६  को भारत ने एक ही झटके में अपनी ८६ प्रतिशत मुद्रा का विमुद्रीकरण कर दिया। सरकार को विश्वास था कि इसका परिणाम आतंकवाद के वित्तीयन, जाली मुद्रा, काले धन के निर्माण (भंडार पर प्रवाह पर नहीं) और भ्रष्टाचार पर एक निर्णायक आक्रमण के रूप में होगा। हालांकि जैसे-जैसे दिन व्यतीत होते गए सरकार का संदर्भ नकदीविहीन अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गया, जो उसके बाद कम नकद में परिवर्तित हुआ, और अंत में डिजिटल लेनदेन में परिवर्तित हुआ। प्रधानमंत्री मोदी के विरोधी अवाक थे और उनका मानना था कि सरकार का यह कदम विधानसभा चुनावों में जाने वाले कम से कम देश के सबसे बड़े राज्य – उत्तरप्रदेश में – भाजपा की राजनीतिक संभावनाओं को नष्ट कर देगा। हालांकि जैसे-जैसे परिणाम आते गए इसका ठीक उल्टा हुआ। लगभग उसी समय आरबीआई ने विमुद्रीकरण के प्रभावों पर अपने आधिकारिक अनुमान जारी किये और उनमें इस कदम की मोटे तौर पर प्रशंसा ही की गई थी। इसमें कहा गया है कि संपूर्ण कष्ट क्षणिक और अस्थाई था और यह शीघ्र समाप्त हो जाएगा।
    • ८. विश्व स्तर पर बढ़ता आतंकवाद और सुरक्षा की स्थिति 
      • आतंकवादी गुटों के प्रति चयनित कार्यवाही ने उनके निरंतर अस्तित्व और को सुनिश्चित करने और बातचीत के लिए काफी स्थान प्रदान किया है। अफगानिस्तान में तालिबान, जिनकी भारतीयों और अफगानियों, दोनों द्वारा कटु आलोचना की जाती है, लगातार चीन के साथ बातचीत करते हैं जो उनका उपयोग आइएसआइएस को नियंत्रित करने के लिए करता है, जो पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक आन्दोलन (ETIM) के माध्यम से उनके अपने शिनजिआंग प्रांत के लिए खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान की सीमा-पार आतंकवादी गतिविधियाँ जारी हैं, और ब्रिक्स (गोवा, २०१६) में चीन और रूस दोनों भारत के उस प्रस्ताव को मानने से इंकार करते हैं जिसमें कड़े शब्दों में इसकी निंदा का प्रस्ताव किया गया था। अफगानिस्तान से अमेरिका (वास्तव में नाटो की आइएसएएफ - ISAF) की वापसी का परिणाम एक विचित्र स्थिति की ओर इशारा करता है, जहाँ कुछ अन्य देश वहां अपनी उपस्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। यूरोप में आतंकवादी हमले भयानक तेज आवृत्ति से जारी रहते हैं, जो अब तक पलायन करने वाले शरणार्थियों की दृष्टि से स्वर्ग समान था, जिसके परिणामस्वरूप विश्व भर में “दक्षिणपंथी” राष्ट्रवादी पार्टियों का उदय हुआ।
    • ९. संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए आवश्यक मंथन और पुनर्निर्माण
      • इस सब के बीच एकमात्र वैश्विक राजनीतिक निकाय जो कुछ अलग कर सकता है, संयुक्त राष्ट्र संघ, उदास और मरणासन्न अवस्था में बना हुआ है। उसका सबसे मजबूत निर्णय करने वाला निकाय – सुरक्षा परिषद – पूरी तरह से एक ऐसी विश्व व्यवस्था का परावर्तक बना हुआ है जिसका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। देशों के बहुविध समूह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं, जिसके कारण प्रतिद्वंद्विता बढती ही जा रही है। संघर्षों के परिणामस्वरूप विश्व भर में होने वाले गंभीर नरसंहार (जिनमें सीरिया का उदाहरण ताजा है) इसलिए अनियंत्रित हैं क्योंकि यह बड़ी शक्तियों के बीच संघर्ष है जिनमें से कोई भी अपना स्थान छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। 
    • १०. बढती असमानता और संपत्ति का संकेंद्रण 
      • अत्यंत निराशाजनक आवृत्ति के साथ ऑक्सफेम जैसे गैर-सरकारी संगठन हमें जानकारी देते हैं कि किस प्रकार से कुछ मुट्ठीभर लोगों – सच्चे अर्थों में मुट्ठीभर – ने पिछले ५० वर्षों के दौरान मानवता द्वारा निर्मित की गई संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया है। यह आधुनिक वैश्विक व्यवस्था की दृष्टि से अच्छा संकेत नहीं है कि केवल १०  या २० प्रतिशत लोग आधी मानवता (अर्थात ३५०,००,००,००० लोग) के बराबर संपत्ति पर कब्ज़ा किये हुए हैं। यह इस असंभवता का संकेत है कि विश्व में से कभी भी गरीबी और निराश्रितता का अंत नहीं हो सकता, क्योंकि संपन्नता के फल और भी अधिक असमान रूप से वितरित हैं। २१ वीं सदी में पूँजी किस प्रकार से कार्य करेगी इसका विश्लेषण करते हुए थॉमस पिकेटी इससे भी अधिक निराशाजनक चित्र चित्रित करते हैं। पिछले १०० वर्षों के दौरान विश्व की कहानी अलग ही रूप से सुनाई जा रही थी। 

अतः विश्व की रचना जिस प्रकार से २० वीं सदी में की गई थी, उससे उसने एक अलग ही मोड़ ले लिया है, और भारत में इसका प्रभाव सभी के द्वारा महसूस किया जाएगा। अब हम अपना ध्यान भारतीय परिदृश्य पर केंद्रित करते हैं, ताकि हम यह गहराई से जान सकें कि वास्तव में क्या चल रहा है। 



भारत - पिछले २५ वर्षों की प्रमुख घटनाओं की त्वरित सूची



बदलाव का समय, उथल-पुथल का समय, स्थिरता का समय हमने शायद सब देख लिया है


  • एल.पी.जी. घटना : वर्ष १९९० के विनाशकारी काल के बाद प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व के लिए खोल दिया, जो हमारे तेजी से घटते विदेशी विनिमय भंडारों के कारण हमारी  मजबूरी  थी। उदारीकरण – निजीकरण – वैश्वीकरण (LPG) से उठी लहरों ने आने वाले वर्षों के दौरान सच्चे अर्थों में भारत को परिवर्तित कर दिया। 
  • आर्थिक नीतियों में राजनीतिक सातत्य (निरंतरता) : देश और राज्यों में होने वाले राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद निजी क्षेत्र को उसके हिस्से का सम्मान नियमित रूप से मिला। प्रत्येक सत्ता परिवर्तन के समय होने वाले भय कि आने वाली सरकार उदारीकरण के शासन को समाप्त कर देगी, निराधार साबित हुए।
  • एक निर्माणाधीन विशाल काया : भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार नियमित रूप से बढ़ा, १९९१ के छोटे २७४ अरब डॉलर (सांकेतिक जीडीपी) के आकार से यह वर्ष २०१७ में बढ़कर विशालकाय  २.६ खरब डॉलर हो गया। यह विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। (चीन के तुलनात्मक आंकड़े हैं $ ४२४ बिलियन (१९९१) और $ ११.३  ट्रिलियन (२०१७))
  • लोकतंत्र जीवित है : बढती लोकसंख्या और अपेक्षाकृत अराजकता के बावजूद भारत लोकतंत्र बने रहने में सफल रहा। कुछ संस्थाएं मजबूती के साथ खडी रही हैं, जिनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग हैं, जो भारत को अपने लोकतांत्रिक मार्ग पर बने रहने के लिए आवश्यक संजीवनी प्रदान करते हैं।
  • अनुग्रह (खैरात) और पुनर्वितरण की राजनीति : यूपीए द्वारा लगातार दस वर्षों तक की गई पुनर्वितरक राजनीति में शासन के दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले जिसमें संपूर्ण परिदृश्य में विशाल कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किये गए (शिक्षा का अधिकार, खाद्य का अधिकार इत्यादि)
  • सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग परिपक्व हुआ भारत का उद्योग और सेवा बेहतरीन ढंग से विस्तारित हुआ – प्राचीन और अप्रचलित श्रम कानूनों के बावजूद उद्योग क्षेत्र और सेवा क्षेत्र (अधिकांश रूप से सूचना प्रौद्योगिकी) इस लिए विस्तारित हुआ क्योंकि उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं था।
  • अनिवासी भारतीय समूह परिपक्व हुआ : भारतीय लोग विश्व भर में फ़ैल गए। संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम आंकडे दर्शाते हैं कि विश्व में सर्वाधिक अनिवासी भारतीय हैं। वास्तव में यह असाधारण है!
  • नरेंद्र मोदी का आगमन : फिर वर्ष २०१४ में एक मुख्यमंत्री के केंद्रीय परिदृश्य पर उभरने के परिणामस्वरूप भारत की राजनीतिक दिशा में नाटकीय रूप से परिवर्तन हुआ। आज का संपूर्ण कथानक उनका ही लिखा हुआ है, और विमुद्रीकरण की पृष्ठभूमि में हाल ही में मिली चुनावी विजयों ने अब भारतीय इतिहास पर उनकी अमित छाप छोड़ना सुनिश्चित कर दिया है। 
  • विमुद्रीकरण :  अपनी तरह का विश्व का सबसे बड़ा विमुद्रीकरण का प्रयोग एनडीए सरकार द्वारा नवंबर 2016 में किया गया। मोदी के राजनीतिक विरोधी इसके बारे में यह कहकर चिल्लाते रहे कि इसने गरीबों के जीवनयापन के साधन नष्ट कर दिए हैं। परंतु चुनाव परिणामों से ऐसा प्रतीत होता है कि गरीब लोग चुपचाप समृद्ध लोगों की संपत्ति के विनाश का तमाशा देख रहे थे।
  • निर्णायक चुनाव परिणाम : एक ऐसा चुनाव जिसमें वर्ष २०१९ के केंद्रीय चुनावों की दिशा बदलने की क्षमता है, संपन्न हो गया है। और इसी के साथ  विरोधी दलों (बसपा, कांग्रेस, सपा, जनता दल (यू), तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, इत्यादि) की मोदी की भाजपा के विरुद्ध एक विश्वसनीय और सशक्त महागठबंधन बनाने या अकेले दम पर मोदी को चुनौती प्रस्तुत करने की आशा भी समाप्त हो गई। 

उपरोक्त सूची इस बात का अच्छा चित्र प्रस्तुत करती है कि पिछले २५ वर्षों के दौरान भारत किस प्रकार से बदला है। यह आने वाले वर्षों का भी इशारा देती है। हम प्रमुख घटनाओं और घटनाक्रमों का गहराई से अध्ययन करेंगे। 




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तीन प्रमुख आर्थिक और राजनीतिक घटनाएँ

आज और आने वाले कल के भारत को परिभाषित करने वाली!



हमारी राजनीति का संबंध इस बात से है कि विभिन्न समूहों के बीच शक्ति किस प्रकार साझा होती है। और हमारी अर्थव्यवस्था का संबंध हमारे संसाधनों, और उनका उपयोग भारत की भौतिक समृद्धि और दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के लिए किस प्रकार से किया जाता है, इस बात से है। हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था इसे संभव बनाने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है। हमारी सामाजिक अर्थव्यवस्था का संबंध इस विशाल देश में कल्याण और लाभों का समाज के विभिन्न वर्गों के बीच वितरण से है। और अंत में, हमारी चुनावी राजनीति वह उत्प्रेरक है जो प्रत्येक ५ वर्ष में राजनीति, और इसलिए राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पुनर्निर्धारित करती है। चलिए हम इस विशाल मुद्दे को समझने की विस्मयकारी यात्रा शुरू करते हैं। 

हम इन तीनों पर गहरी नज़र डालेंगे - भारतीय राजनीति की स्थिति, भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, भारतीय विदेश नीति, रक्षा और सैन्य स्थिति 


. भारतीय राजनीति की स्थिति – २०१७-१८ 



स्वतंत्रता के बाद से कई दशकों तक देश के राजनीतिक परिदृश्य पर केवल एक दल का वर्चस्व था। जिस दल ने ऐसा किया उसने सफलतापूर्वक उपनिवेशकालीन अपने स्वतंत्रता संघर्ष को स्वतंत्र भारत में परिवर्तन के आश्वासन के साथ आगे बढाया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (स्थापना १८८५) ने अनेक वर्षों तक संपूर्ण भारत पर निर्बाध रूप से शासन किया। उसका एक दिलचस्प इतिहास है – उसकी स्थापना  २८ दिसंबर १८८५ को मुंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय में हुई जिसमें  ७२प्रतिनिधि उपस्थित थे। इसके पहले महासचिव अंग्रेज ए. ओ. ह्यूम थे और व्योमेश चंद्र बैनर्जी इसके पहले निर्वाचित अध्यक्ष थे। हालांकि 1876 में स्थापित इंडियन सोसाइटी अपनी तरह का पहला राजनीतिक निकाय था, परंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की लहर चल निकली।

जैसे-जैसे भारत का आकार, जटिलता और राजनीतिक आकांक्षाएं बढीं वैसे-वैसे एक दल (और एक वंश – गाँधी परिवार) द्वारा दिल्ली से केंद्रीकृत नियंत्रण कमजोर पड़ने लगा। उस मॉडल को आक्रामक और गतिमान भाजपा नेता ने वर्ष २०१४ में पुनर्स्थापित कर दिया! जिसे २००० के दशक में असंभव माना जा रहा था, वही अब एक स्पष्ट निश्चितता बन गई है। जिसे इस विशाल और विविधतापूर्ण देश में गठबन्धनों और क्षेत्रीय क्षत्रपों की अपरिहार्यता कहा जाता था, उसे ही अब महत्वाकांक्षी योजनाओं, आक्रामक चुनाव प्रचार और एक खुले राष्ट्रवादी एजेंडे  के नेतृत्व में एक एकरंगी भव्य दृष्टिकोण कहा जा रहा है जो करोड़ों नागरिकों को अपनी ओर खींच रहा है क्योंकि वे एक शत्रुतापूर्ण पड़ोस और सभी ओर प्रकट घुसपैठ को देख रहे हैं।

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    • नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारतीय राजनीति में जो कुछ किया है वह प्रतिद्वंद्वी पार्टियाँ हेतु एक ऐसे अत्यंत भयावह दु:स्वप्न के समान है जिसकी वे कल्पना भी नहीं करना चाहेंगी। कुछ ही वर्षों में उन्होंने (ए) राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है, (बी) एक ऐसे दल को पुनरुज्जीवित कर दिया है जो जड़ हो रहा था, (सी) ऐसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं जो प्रत्येक नागरिक के जीवन को छूने वाली हैं (एक साहसिक कदम), (डी) एक व्यक्तिगत ब्रांड का निर्माण किया जिसकी हरेक पर, और यहाँ तक कि संयुक्त रूप से भी सभी पर हावी होने की क्षमता है, 
    • (ई) ऐसी राष्ट्रीय राजनीति में एक व्यक्तिगत करिश्मा निर्मित किया जो छोटे आकार के सपनो की आदी हो चली थी, और (एफ) और ऐसी प्रशासनिक कुशलता दिखाई है जिसका कोई सानी नहीं है जैसा कि विभिन्न केंद्रीय योजनाओं की सूक्ष्म से सूक्ष्म विस्तार से स्पष्ट है, सर्वव्यापी "डैशबोर्ड" (एक बढ़िया संकलन पढ़ें यहाँ) इनके सर्वाधिक प्रबल नमूने हैं ! [ध्यान रखें गहरा अध्ययन करने के इच्छुक गंभीर विद्यार्थियों के लिए अंत में बोधि लिंक्स खंड में हमनें काफी पढने, देखने और सुनने के लिंक प्रदान किये हैं] 

राष्ट्रीय राजनीति में इस विवर्तनिक परिवर्तन की शुरुआत वर्ष 2013 में तब हुई जब नरेंद्र मोदी को वर्ष 2014 के आगामी चुनावों के लिए भाजपा का प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी निर्वाचित किया गया। यूपीए शासन (लगातार दो 5-वर्षीय शासनकाल, कुल 10 वर्ष) विशालकाय घोटालों से ग्रस्त हो चुका था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 6 “राष्ट्रीय राजनीतिक दल थे” – (1) भारतीय जनता पार्टी या भाजपा - कमल का फूल, (2) बहुजन समाज पार्टी या बसपा – हाथी, (3) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी या भाकपा – हंसिया और हथौड़ा, (4) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी या माकपा – हंसिया, हथौड़ा और सितारा, (5) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस – हाथ का पंजा, और (6) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या राकांपा – घडी। इस चुनाव में ३९ क्षेत्रीय दल भी मैदान में थे जिनमें द्रमुक, अन्ना द्रमुक (तमिलनाडु), तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल), बीजेडी (ओडिशा), झामुमो (झारखण्ड), राजद (बिहार), रालोद (उ.प्र.) और सपा (उ. प्र.) शामिल थे। भारी शोर वाले अखिल-भारतीय या देशव्यापी प्रचार अभियान में भारतीय जनता पार्टी में चुनावों में एकतरफा जीत हासिल की। देश के सबसे बड़े चुनावी  अखाड़े, उ.प्र. ने अकेले दम पर मोदी को वर्ष 2014 में देश की कमान सौंप दी (80 में से 71 सांसद!)। वर्ष 2014 के उ.प्र. के 13.88 करोड़ मतदाताओं में से 8.05 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और इनमें से 3.43 करोड़, या 42.6 प्रतिशत ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया जिसके फलस्वरूप उसे 71 सीटें मिलीं जिसने उनकी लोकसभा सीटों की संख्या बहुमत के लिए आवश्यक संख्या से भी अधिक 282 तक पहुंचा दिया। यहाँ यह जानना रोचक है कि भारत में कुल मतदाताओं की संख्या 83.4 करोड़ थी जो विश्व में सर्वाधिक है। चूंकि चीन का इरादा लंबे समय तक गैर-लोकतांत्रिक बने रहने का है, अतः भारत अपना यह कीर्तिमान हमेशा के लिए कायम रखेगा!


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    • भाजपा की तीखे स्वरों में “First Past the Post System” में जीतने के लिए आलोचना हुई, लोगों का दिल जीतने के लिए नहीं। वर्ष 2014 की लोकसभा की अंतिम स्थिति इस प्रकार थी : भाजपा – 282 सीटें, उन्हें 17.16 करोड़ मत प्राप्त हुए, जो कुल का 31.3 प्रतिशत था; कांग्रेस – 44 सीटें, 10.69 करोड़ मत प्राप्त हुए, कुल का 19.5 प्रतिशत; अन्ना द्रमुक – 37 सीटें, 1.81 करोड़ मत प्राप्त हुए, कुल का 3.2 प्रतिशत।
    • भाग्य के ऐसे पलट जाने को कांग्रेस ने सही तरीके से स्वीकार नहीं किया, जो अब ऐसी स्थित में आ गयी थी जिसमें वह तकनीकी रूप से लोकसभा में "विपक्ष के नेता" का पद भी नहीं मांग सकती थी (उस हेतु कुल सीटों के १०% की हिस्सेदारी परंपरागत रूप से मान्य है)। भाजपा ने भी बड़ा दिल नहीं दिखाया। एक राजनीतिक परिदृश्य बना जिसमें कोई भी एक इंच राजनीतिक भूमि भी दूसरे के लिए छोड़ने को तैयार न था। 


२०१४ आम चुनावों में राष्ट्रीय स्थिति 







२०१४ आम चुनावों में राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन (एनडीए) की स्थिति 





२०१४ आम चुनावों में संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे (यूपीए) गठबंधन की स्थिति 






जून 2014 से नवंबर 2016 तक की मोदी सरकार की यात्रा (उनके कार्यकाल का आधा भाग) में व्यापक प्रशासनिक परिवर्तन हुए, भव्य योजनाएं शुरू हुईं, राष्ट्रीय चिन्हों और प्रतीकों पर भाजपा की "दावेदारी" शुरू हुई, जिन्हें कांग्रेस अपनी निजी संपत्ति मानती थी और एक ऐसी दूरदृष्टिता जिसका राजनीति में कोई समानांतर आज तो दिखाई नहीं देता। जमीनी हकीकत भिन्न हो सकती है – भारत एक विशाल देश है, जो अपना समय लेता है परंतु चुनौती दृश्य थी। यह स्पष्ट था कि मोदी एक अभियान पर निकले नेता थे, और योजनाओं के नाम इसका स्पष्ट संकेत है।

अतः जब नरेंद्र मोदी ने अपने ही दम पर व्यक्तिगत घोषणा के माध्यम से 8 नवंबर 2016 को राष्ट्रीय टीवी पर उच्च-मूल्य वाले नोटों का विमुद्रीकरण किया, तो यह एक विशाल आकार का आर्थिक कदम था जिसका प्रयास विश्व में कहीं भी आज तक नहीं किया गया। उनकी पार्टी और आर.बी.आई. "अकेले दम" की बात को नकारते हैं, परंतु यदि विशेषज्ञों पर भरोसा किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से दृश्य है। आलोचकों ने मोदी, उनके वित्तमंत्री और आर.बी.आई. की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि इसे पूरी तैयारी के बिना लागू किया गया, हालांकि अधिकारी और आर.बी.आई. लगातार पुनर्मुद्रिकरण (remonetisation) की अपनी गति का बचाव करते रहे। 10 मार्च 2017 को आर.बी.आई. ने विमुद्रीकरण के प्रभावों का अपना आधिकारिक आंकलन जारी किया और उसने यह आश्वासन दिया है कि कहीं भी कुछ बड़ा नुकसान नहीं हुआ है।



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    • ##inr##  मोदी के विमुद्रीकरण (DeMo) की कथा 
      • इसके साथ यह भी स्पष्ट रूप से दृश्य था कि किस प्रकार से विमुद्रीकरण की कहानी को पहले आतंकवादी निधीयन और देशद्रोही तत्वों से से निपटने के साधन के रूप में प्रसारित किया गया जो अंततः परिवर्तित होकर सभी के लिए लाभकारी डिजिटल अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हुआ। और इसीमें सभी विरोधी दलों की संभावनाएं छिपी थीं, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की आक्रामक तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस (आई) की और आम आदमी पार्टी की भी, जिन्हें वास्तव में लगता था कि यह एक बड़ी गलती थी। भारत एक निरंतर रूप से घूमती हुई राजनीतिक व्यवस्था है  जिसमें चुनाव बड़े से बड़े ब्रांड को पूरी तरह से साफ़ कर सकते हैं। और यह अपेक्षित था कि भारत का सबसे बड़ा राज्य – उत्तर प्रदेश – जिसने वर्ष 2014 में अकेले दम पर मोदी को देश की कमान सौंपी थी, एक बार फिर से भाजपा की संभावनाओं को नष्ट कर देगा और इस प्रकार वर्ष 2019 के चुनावों के लिए एक नई वास्तविकता की शुरुआत करेगा। हमने वर्ष 2014 की कहानी ऊपर देखी है। हमने नोटबंदी का विस्तारपूर्वक विश्लेषण किया है हमारी ##leaf## बोधियों में, हमारे ##leaf## बोधि सारों में, और ##eye## हमारे बोधि शिक्षा के विडियो में। बोधि प्रबोधन (##leaf## प्रीमियम सेक्शन में) हमारे छात्रों और सब्सक्राइबर्स हेतु उपलब्ध हैं.



विपक्ष के दुर्भाग्य से मतदाताओं को ऐसा नहीं लगा। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने इस धुंध को साफ़ कर दिया है, जहाँ अंतिम परिणाम बड़ी हद तक भाजपा के पक्ष में नजर आते हैं।

इस सब को प्रधानमंत्री मोदी की जन धन योजना की सफलता से जोड़ें जिसने कई करोड़ ऐसे लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा है जिन्होंने कभी बैंक देखी भी नहीं थी (नवीनतम जानकारी दर्शाती है कि यह योजना सुचारू रूप से चल रही है) । इस एक बात से हम देख सकते हैं कि मोदी ने देश भर के करोड़ों लोगों के दिलों पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

स्वतंत्र भारत के सभी प्रधानमंत्रियों की सूची :




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मोदी की छवि को बदलने में

कांग्रेस का भी उतना ही हाथ है जितना स्वयं मोदी के दृढ निश्चय का! 



प्रधानमंत्री मोदी ने सफलतापूर्वक स्वयं को "निगमों द्वारा प्रायोजित" प्रत्याशी (मीडिया के अनुसार अदानी, अंबानी) की वर्ष 2014 की छवि से बाहर निकाल लिया है और वर्ष 2017 में वे एक निर्धनों के मसीहा बनकर उभरे हैं। यह एक उल्लेखनीय परिवर्तन है। कांग्रेस अब यह दावा नहीं कर सकती कि मोदी "सूट-बूट की सरकार" चला रहे हैं। संभवतः उनके लगातार हमलों ने मोदी को एक गरीब-समर्थक छवि बनाने की दृष्टि से निर्भीक बना दिया। मोदी की इसी छवि ने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। थोडा और पीछे की ओर देखें, और सोनिया गाँधी द्वारा कहे गए शब्द “मौत का सौदागर” (वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ में, एक ऐसा विषय जिससे अनेक कांग्रेस नेता और अनेक मुस्लिम नेता बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं) ने मोदी को इस स्थापित पार्टी से सीधा मुकाबला करने का हथियार दे दिया। मणिशंकर अय्यर द्वारा किये गए “चायवाला” के कटाक्ष का परिणाम मोदी द्वारा “चाय पर चर्चा” में हुआ। हाल के चुनावों में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव द्वारा किया गया “गुजरात के गधे” पर कटाक्ष उनके ही गले पड़ गया जब मोदी ने एक विशाल चुनावी रैली में गधे के कड़ी मेहनत और निर्धार के गुणों का बखान किया।

मोदी के विरोधियों को अंत में यह पाठ सीख ही लेना चाहिए – यदि आप चाहते है कि वे अपना निर्धार खो दें, तो उनका अपमान करना बंद कर दें। संभवतः उनकी प्रशंसा करना शुरू कर दें! मुस्कुरा दें

2017 के विधानसभा चुनावों के परिणाम 



नोटबंदी के झटके के बाद, ऐसा माना गया था कि विपक्षी दल या तो सरकार को झुकने पर मजबूर कर देंगे, और सरकार निर्णय वापस ले लेगी, या तो कुछ बड़ी छूट देनी पड़ेगी। जैसा कि प्रत्याशित था, कुछ नहीं हुआ। समय बीतता गया। और चुनाव आयोग द्वारा राज्य विधानसभाओं के चुनाव - जिनमें सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश चुनाव भी थे - घोषित कर दिए गए। भाजपा की विजय इसलिए भी अतुलनीय रही चूंकि जिन ६९० विधानसभा सीटों पर चुनाव हो रहे थे, उनमें से ४०३ तो उत्तर प्रदेश में से ही थीं।




न केवल ये पांच घोषित किये गए, बल्कि २०१७ में और चुनाव भी कतार में हैं, जिनमें प्रधानमंत्री का गृह राज्य (और उनके विश्वासपात्र पार्टी प्रमुख अमित शाह का भी) गुजरात भी है, और राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पदों के चुनाव भी हैं।




चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हुए, जैसा भारत में होता है. सारा श्रेय निश्चित रूप से चुनाव आयोग की बेहद विस्तृत योजनाबध्द कार्यकुशलता को, और भारत की लोकतांत्रिक भावनाओं को ही जाता है।

कुल चुनाव : ६९० विधानसभा क्षेत्रों में (जिनमें उत्तरप्रदेश में - ४०३) परिणाम ये रहे :

विस्तृत विवरण यहाँ है :

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    • 1. पंजाब
      • चुनाव 4 फरवरी को हुए जिसमें 78 प्रतिशत मतदान हुआ। सभी 117 सीटों पर प्रमुख दलों, (शि.अ.द. आप, कांग्रेस) के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ और परिणाम 11 मार्च को घोषित किये गए। सीटों की अंतिम स्थिति  – कुल सीटें 117, कांग्रेस (आई) 77, आप 20, शि.अ.द. 15, भाजपा 3। 
    • 2. उत्तरप्रदेश
      • चुनाव सात चरणों में 11 फरवरी से 9 मार्च के दौरान हुए जिनमें मतदान का प्रतिशत 78 प्रतिशत रहा। चुनाव अत्यंत कटु वातावरण में लड़े गए जिसमें अनेक शब्दबाणों का प्रयोग हुआ। कुल 403 सीटों में से अधिकांश सीटों पर प्रमुख दलों (भाजपा, सपा+कांग्रेस, बसपा) के बीच त्रिकोणीय या उससे अधिक प्रत्याशियों के बीच मुकाबला था और इसके परिणाम 11 मार्च को घोषित किये गए। सीटों की अंतिम स्थिति : कुल सीटें 403 – भाजपा 312, सपा + कांग्रेस – 47 + 7, बसपा – 19, अपना दल (सोनेलाल) 9।
    • 3. उत्तराखंड
      • चुनाव 15 फरवरी को हुए और मतदान का प्रतिशत 65 था। इन चुनावों में अधिक कटुता नहीं दिखाई दी। लगभग सभी 70 सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था और इसके परिणाम 11 मार्च को घोषित किये गए। सीटों की अंतिम स्थिति : कुल सीटें 70 : भाजपा 57, कांग्रेस 11।
    • 4. गोवा
      • चुनाव 4 मार्च को हुए जिनमें मतदान का प्रतिशत 83 प्रतिशत रहा। ये चुनाव करिश्माई नेता मनोहर पर्रीकर के रक्षामंत्री बनने के बाद भाजपा की अपने राज्य पर पकड़ बनाए रखने की परीक्षा के रूप में थे। 40 सीटों वाली विधानसभा की अधिकांश सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था, जिन्हें महाराष्ट्रवादी गोमांतकपार्टी ने इन्हें कुछ हद तक कठिन बना दिया था, साथ ही गोवा फॉरवर्ड पार्टी और आम आदमी पार्टी ने सत्ता के लिए साहसिक प्रयास किया था। परिणाम 11 मार्च को घोषित किये गए। सीटों की अंतिम स्थिति : कुल सीटें : 40 – भाजपा 13, कांग्रेस 17, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी 3, गोवा फॉरवर्ड पार्टी 3 आप 0। राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने भाजपा को आमंत्रित किया (जिसका नेतृत्व अब मनोहर पर्रिकर कर रहे थे - जिन्होंने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया) और इसपर तुरंत कांग्रेस ने आपत्ति उठायी एवं भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की अदालत में याचिका दायर कर मांग की कि राज्यपाल के "असंवैधानिक" निर्णय को ख़ारिज किया जाये। १४ मार्च को, उच्चतम न्यायालय ने मुख्यमंत्री के रूप में पर्रिकर के शपथ-ग्रहण विधि पर रोक लगाने से इंकार करते हुए विधानसभा में १६ मार्च को शक्ति परीक्षण का आदेश दिया। 
    • 5. मणिपुर
      • चुनाव 4 मार्च और 8 मार्च 2017 को संपन्न हुए जिनमें मतदान का प्रतिशत 65 प्रतिशत रहा। ये चुनाव भाजपा के उत्तर-पूर्व में विस्तार की परीक्षा और कांग्रेस की राज्य पर पकड़ बनाए रखने की परीक्षा के रूप में थे। 60 सीटों वाली विधानसभा की अधिकांश सीटों पर मुकाबला सीधा भाजपा और कांग्रेस के बीच था जिसमें नागा पीपल्स फ्रंट और नेशनल पीपल्स पार्टी ने कुछ और रंग भर दिया। परिणाम 11 मार्च 2017 को घोषित किये गए। सीटों की अंतिम स्थिति : कुल सीटें 60 : भाजपा 21, कांग्रेस 28, नागा पीपल्स फ्रंट 4, नेशनल पीपल्स पार्टी 4। 
    • 6. गुजरात
      • नवंबर 2017 में होने की संभावना है। वर्ष 2017 के गुजरात चुनाव मोदी-अमित शाह जोड़ी के लिए अग्नि-परीक्षा होंगे क्योंकि गुजरात उनका गृह राज्य है। स्पष्ट है कि वे इन चुनावों को जीतने के लिए कोई कसार नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस और आप, दोनों इसे 2019 के आम चुनाव के पूर्व मोदी और शाह के विजय रथ को रोकने के अवसर के रूप में देखेंगे।
    • 7. हिमाचलप्रदेश
      • ये चुनाव दिसंबर 2017 में होने की संभावना है। 
    • राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति 
      • संवैधानिक पदों की दृष्टि से दो महत्वपूर्ण चुनाव – राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति – 25 जुलाई 2017 के पूर्व होने हैं। यह वह अवधि है जब राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी और उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का पांच वर्षीय कार्यकाल समाप्त होगा। उ.प्र. चुनावों में विजय भाजपा की राज्यसभा की स्थिति में काफी सुधार करेंगे जिससे यह सुनिश्चित होगा कि राष्ट्रपति के पद पर भाजपा की पसंद का उम्मीदवार चुना जाएगा।

राजनीतिक दलों का राज्यवार प्रदर्शन 



गोवा






गोवा मामला तब टेढ़ा हो गया, जब कांग्रेस ने संवैधानिकता के मुद्दे उठा कर राज्यपाल के निर्णय को गलत ठहराया, चूंकि कांग्रेस सबसे बड़े विधायक दल के रूप में उभरी थी, और उसे ही सरकार बनाने हेतु आमंत्रित किया जाना चाहिए था, न कि भाजपा (और सहयोगी) को। इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर की अदालत में उठाया गया, जब उच्चतम न्यायलय की होली की छुट्टियां चल रही थीं. शपथ-ग्रहण पर तो रोक नहीं लगी, किन्तु विधानसभा में शक्ति प्रदर्शन का आदेश दिया गया। 

मणिपुर







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पंजाब 




कांग्रेस में क्षेत्रीय क्षत्रपों का उत्थान तब दिखा जब कप्तान अमरिंदर सिंह (जो राहुल गाँधी की पहली पसंद नहीं थे) ने पार्टी को जीत दिला दी। क्रिकेटर-राजनेता  नवजोत सिंह सिद्धू ने भी भाजपा छोड़ उनका दामन थाम लिया। 


उत्तराखंड 




और सबसे महत्वपूर्ण - उत्तर प्रदेश! 








एक बेहद तगड़े चुनावी मौसम में, सभी दलों ने एक-दूसरे पर शाब्दिक बाण छोड़े। अमित शाह की ताक़त पुनः सिद्ध हुई जब उनके अतुलनीय ज़मीनी समीकरणों, राजनीतिक गठजोड़ों और रणनीतियों ने भाजपा को सबसे बड़े राज्य में ३ वर्षों में दूसरी बड़ी जीत दिला दी। जातिगत समीकरण अनेक वर्षों तक विशेषज्ञों और विरोधियों को चकित करते रहेंगे।


२०१७ विधानसभा चुनाव परिणामों का प्रभाव



एक ऐतिहासिक दृष्टिपात पहले करें : (१) १९८४ के लोकसभा चुनावों में राजीव गाँधी की कांग्रेस (आई) ने ८५ में से ८३ सीटें जीतीं थीं, ५१ % मत हिस्सेदारी के साथ। किन्तु विधानसभ चुनावों में वे केवल ३९.५ % मत प्रतिशत के साथ ४२५ में से २६९ सीटें ही जीत सके। (२) १९९१ के लोकसभा चुनावों में, भाजपा ने ३२.८ % मत हिस्सेदारी के साथ ५१ सीटें जीती थीं, फिर १९९६ में वह पुनः ३३.४ % मत हिस्सेदारी के साथ ५२ सीटें जीती, और १९९८ में वह ३६.४ % के साथ ५७ सीटें जीती। किन्तु लोकसभा में सबसे आगे होते हुए भी वह विधानसभा में ऐसा नहीं कर सकी।


मोदी की भाजपा ने २०१७ में ३९.७ % मत हिस्सेदारी के साथ ३१२ सीटें जीतीं। और ऐसा तब, जब वे २०१४ के लोकसभा में ४२.३ % मत हिस्सेदारी के साथ ८० में से ७१ सीटें जीत चुके थे।



इन परिणामों का सीधा और तात्कालिक प्रभाव निम्नानुसार होगा 

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    • 1. केंद्र सरकार के नीतिगत दृष्टिकोण को पूर्णाधिकार (मुक्त हस्त)
      • वर्ष 2014 से एक असहज विरोधी पक्ष, जो लोकसभा (भारतीय संसद का निचला सदन) में अल्पमत में है, ने राज्यसभा में विधेयकों को अटकाकर मोदी सरकार के लिए स्थिति कठिन बना दी, जहाँ भाजपा की स्थिति कमजोर है। इसने न केवल प्रमुख सुधारों की गति को धीमा कर दिया था बल्कि कार्रवाई योग्य नीतिगत निर्णयों को भी बाधा पहुंचाई है। प्रधानमंत्री का 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान किया गया “अच्छे दिन” का वादा भी अटका हुआ था क्योंकि विरोधी दलों ने प्रमुख निर्णयों में रुकावटें पैदा की थीं। इनसे बचने के लिए या तो अध्यादेशों का सहारा लिया गया या धन विधेयक प्रस्तुत किये गए (आधार मामला)। वर्ष 2017 की विजय, जिसमें उ.प्र. की भारी जीत भी शामिल है, ने प्रधानमंत्री मोदी को अब आवश्यक बढ़ावा और मुक्त रूप से काम करने का अवसर दिया है, जहाँ उन्होंने विमुद्रीकरण के मुद्दे पर विरोधी दलों के नैतिकता के बड़े-बड़े दावों को धूल चटा दी है। जनता की वाणी बोली है, और देखिये किस तरह बोली है!
    • 2. गहरे आर्थिक सुधार अब एक निश्चित संभावना प्रतीत हो रहे हैं 
      • प्रधानमंत्री मोदी एक काम में विश्वास करने वाले व्यक्ति हैं। वे एक सुधारक हैं और ऐसे प्रशासक हैं जो लोगों से काम करवाना जानते हैं। दुर्भाग्य से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक कुछ सुधार उनके कार्यकाल के पहले ढाई वर्षों में क्रियान्वित नहीं हो पाए। मार्च 2017 की यह विशाल प्रेरणा अब उन्हें संभव बनाते हैं, और अगले कुछ महीनों के दौरान सरकार लंबित मामलों पर बड़े सुधार कर सकती है। भारत को रोजगार निर्माण को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना आवश्यक है, और श्रम कानूनों में सुधार भी अत्याश्यक हैं। संगठित क्षेत्र में निहित स्वार्थों से ग्रस्त एक संवेदनशील विषय होने के कारण मोदी और भाजपा इस विषय में संकोच कर रहे थे। अब ऐसा नहीं होगा। प्रमुख कार्यक्रम मेक इन इंडिया, जो मोदी और डीआईपीपी के अमिताभ कांत के दिमाग की उपज है, उतना सफल नहीं हुआ जितना वे चाहते थे। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए और भी अधिक संरचनात्मक और प्रणालीगत सुधारों की आवश्यकता है। 
    • 3. बैंकिंग क्षेत्र का अभिशाप – अनर्जक परिसंपत्तियां –  अब हल हो सकता है
      • भारत की आर्थिक समीक्षा एक आधिकारिक नीतिगत दस्तावेज है जिसका निर्माण सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार द्वारा किया जाता है और जो अर्थव्यवस्था की कुछ गहरी बुराइयों को उजागर करता है। साहस का एक नमूना उदय योजना – उज्जवल डिस्कॉम सुनिश्चिती योजना – में दिखाई दिया, एक ऐसी योजना है जिसने लगभग दिवालिया हुई राज्य विद्युत वितरण कंपनियों में साहसिक ऋण अधिग्रहण और बंधक-पत्र निर्गमन के माध्यम से सुधार किया। यह एक अत्यंत खतरनाक राजनीतिक जमीन थी। वर्ष 2015 से सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों की अनर्जक परिसंपत्तियां काफी ध्यान आकर्षित कर रही थीं और सर्वेक्षणों ने "पारा" (P A R A) नामक एक बुरी बैंक (Bad Bank) के निर्माण की संभावनाओं का संकेत दिया था। परंतु राजनीतिक दृष्टि से यह एक अत्यंत जोखिम भरा प्रदेश है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों को लंबे समय से संचित शेष ऋणों का समाधान करना होगा जिह्नें वे अब तक निगमित संरचित ऋणों (restructured corporate debt) के नाम पर आगे धकेलते रहे थे। एक अति विशाल राजनीतिक जनादेश ही अब चीजों को करना संभव बनाएगा। और इसके लिए साफ-सुथरी छवि के साथ प्रधानमंत्री मोदी के लावा और कौन उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है (बिरला रिश्वत मामला, जो कुछ समाचारपत्रों में उछला था, सर्वोच्च नयायालय को अधिक प्रभावित नहीं कर पाया)। अब "बुरी बैंक" (Bad Bank) गठित हो सकती है और उसके गठन के साथ ही अनर्जक परिसंपत्तियां भूतकाल की वस्तु हो जाएंगी। या इसके लिए सरकार 2019 के चुनावों तक राह देखेगी? 
    • 4. मोदी सिद्धांत को उत्प्रेरणा मिलेगी 
      • प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति पुनर्जीवित करने हेतु अपनी स्वतंत्र कार्यशैली प्रतिपादित की। इसके लिए उन्होंने विश्व के विभिन्न देशों की गहन और व्यापक यात्राएं कीं और विश्व के नेताओं के साथ संबंधों के टूटे हुए पुलों को जोड़ने का प्रयास किया। इसका परिणाम मोदी सिद्धांत के निर्माण में हुआ, जो विश्व की नज़रों में व्यक्तिगत रूप से निर्मित भारत की सकारात्मक छवि है जो आज देश महसूस करता है। विदेश मंत्रालय का दावा है कि इसका परिणाम सकारात्मक घरेलू घटनाक्रमों में भी हुआ है क्योंकि वर्ष 2014 के बाद विदेशी निवेश के प्रवाहों में वृद्धि हुई है। वैश्विक और घरेलू चिंताओं के एक सही ताने-बाने ने अब फल देना शुरू किया है। अब मोदी सिद्धांत को और भी अधिक बढ़ावा मिलेगा, और राष्ट्रपति ट्रम्प की अस्थिरता से परिभाषित विश्व में निर्णायक चुनावी जनादेश सही समय पर हुई महत्वपूर्ण घटना है। कल्पना करें कि यदि मोदी और भाजपा उ. प्र. चुनाव हार जाते तो सरकार के लिए स्थिति कितनी कठिन हो जाती।
    • 5. 2022 से आगे जाने वाली दीर्घकालीन दूरदृष्टि 
      • प्रधानमंत्री के बारे में एक चीज जिसे हम कतई नजरंदाज नहीं कर सकते वह है दीर्घकालीन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के प्रति उनका जूनून। 12 मार्च को भाजपा मुख्यालय में आयोजित विजय समारोह में उन्होंने 2022 के अपनी व्यक्तिगत दूरदृष्टि को प्रस्तुत किया – जब स्वतंत्र भारत अपने 75 वर्ष पूरे करेगा ! इसका न केवल विरोधी दलों के लिए एक गहरा अर्थ है (क्या वे अब 2019 के परिणामों को अपने पक्ष में मानकर चल रहे हैं?) बल्कि यह दर्शाता है कि यह उनकी पूर्व की अति महत्वाकांक्षी शैली की योजनाएं, स्वच्छ भारत अभियान के माध्यम से वर्ष 2019 तक भारत को स्वच्छ बनाने की योजना – महात्मा गाँधी की 150 वीं जयंती तक – आने वाले समय में और भी अधिक मजबूत होगी। क्षेत्रीय दल प्रमुख  योजनाओं से जुड़े प्रधानमंत्री के तमगे से चौकन्ने हैं, और उन्हें भय है कि यह संघीय ताने-बाने में एक अतिक्रमण है। अब यह विरोधी दलों के समक्ष एक चुनौती है कि वे 2019 के चुनावों में प्रधानमंत्री का मुकाबला किस प्रकार करेंगे। भाजपा ने गंभीरता से अधिकांश राष्ट्रीय विरासतों का स्वामित्व स्वीकार करना शुरू कर दिया है, जैसे डॉ. बी.आर. आंबेडकर, महात्मा गाँधी, और सरदार पटेल। भाजपा (एनडीए) ने अत्यंत चतुराईपूर्वक UIDAI आधार कार्ड (जो वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नंदन निलेकनी, जो स्वयं आईटी उद्योग के महारथी और करोडपति हैं, के दिमाग की उपज है)  का त्याग नहीं किया जो अब डिजिटल अर्थव्यवस्था के स्वप्न की उड़ान की दृष्टि से काफी सुविधाजनक हो गया है।



मोदी जी ने इस प्रकार इस विशाल जीत को स्वीकार किया 








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२. भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति – २०१७-१८ 



प्रति वर्ष प्रस्तुत होने  वाला केंद्रीय बजट और उसके साथ आने वाली आर्थिक समीक्षा अत्यंत कुशलता से बनाए गए दस्तावेज हैं। समीक्षा विश्व स्तर पर बेंचमार्क किये गए मानदंडों पर अर्थव्यवस्था की कमियों को उजागर करने का काम करती है, और बजट कुछ हद तक उनपर उपाय सुझाने का काम करता है। ये प्रवृत्तियां वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था में देखी जा सकती हैं। राज्य सरकारों के साथ केंद्र सरकार को मिलकर काम करना होगा ताकि न केवल भारतीय लोगों की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की जा सके बल्कि व्यापार की सुगमता में भी सुधार किया जा सके ताकि उद्यमिता को बढ़ावा मिल सके।

गहराई से अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए हमनें अंत में दृश्य / वाक और श्रवण लिंक प्रदान किये हैं।


  • प्रवृत्ति  1. विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था 
    • सभी कठिनाइयों, और विमुद्रीकरण के बावजूद हमने इस तमगे को बनाए रखा है। विविध वैश्विक विश्लेषण और अनुमान इनसे सहमत हैं। चूंकि चीन “निवेश प्रेरित वृद्धि से उपभोग आधारित वृद्धि” की समस्या से संघर्षरत है, अतः उम्मीद है कि आने वाले कुछ समय तक भारत तालिका के शीर्ष स्तर पर बना रहेगा। विमुद्रीकरण पर आरबीआई की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है, वैसे ही केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा जारी आंकडे भी इसकी पुष्टि करते हैं। [याद रखें गहराई से अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए हमनें अंत में दृश्य / वाक और श्रवण लिंक प्रदान किये हैं]
  • प्रवृत्ति 2. रोजगारविहीन वृद्धि औपचारिक क्षेत्र में रोजगार निर्मिती को बाधित कर रही है  
    • भारत का रोजगार इंजन बेहद धीमा पड़ गया है और वर्तमान में यह ठंडा है। औपचारिक क्षेत्र की पूर्णकालिक अच्छा वेतन देने वाली नौकरियां लगभग शून्य गति से बन रही हैं। यह सरकार द्वारा किया गया नहीं है, बल्कि यह निगमित क्षेत्र को ग्रस्त करने वाले अनेक कारकों का परिणाम है – बढ़ता स्वचालन, जिसका परिणाम बेकार कर्मचारियों की बढती संख्या में हो रहा है, विवैश्विकरण का बढ़ता खतरा जो निगमों को नकदी को परियोजनाओं में निवेश करने के बजाय अपने पास रखने के लिए मजबूर कर रहा है, नौकरशाही की लालफीताशाही जो परियोजनाओं को अटकाकर रख रही हैमेक इन इंडिया जैसे बड़े विचारों की अल्प सफलता। अधिक रोजगार निर्माण जो भाजपा का वर्ष 2014 के चुनाव अभियान में किया गया एक वादा था जिसके बूते उसे सफलता मिली, इसकी अभी तक शुरुआत नहीं हुई है। 
  • प्रवृत्ति 3. जनसांख्यिकी लाभांश का पूरा उपयोग नहीं किया जा सका है
    • एक प्रासंगिक, और अधिक सघन समस्या है लाखों युवाओं को उत्पादक और कुशल बनाने की दृष्टि से उचित शिक्षा या प्रशिक्षण प्राप्त नहीं हो रहा है। भारत में व्यापक रूप से फैला अनौपचारिक क्षेत्र (जहाँ 80 प्रतिशत रोजगार प्राप्त लोग इसमें संलग्न हैं) दर्शाता है कि प्रति व्यक्ति आय को मध्यम आय वर्ग से बाहर लाने और हमारे लोगों को वास्तव में संपन्नता की पहचान होने  के लिए हमें अनेक दशकों का समय लगेगा। आश्चर्यजनक बात यह है कि 1950 से शुरू किये गए कल्याणकारी कार्यक्रमों को प्रभावी होने में इतना समय क्यों लगा। ऐसा क्यों है कि “गरीब और जरूरतमंद” अनेक राजनीतिक नेताओं के लिए सुविधाजनक वोट-बैंक बन गए हैं।
  • प्रवृत्ति 4. निर्यात और आयात इंजन बिखर रहे हैं 
    • जटिल कारकों के संयोजन का परिणाम भारत के निर्यात परिमाणों, साथ ही आयात परिमाणों की गिरावट में हुआ है। जबकि वस्तु चालित निर्यात ऐसी वस्तु है जिनमें गिरावट का हम स्वागत करेंगे (कम से कम लागत की दृष्टि से) क्योंकि वस्तुओं की वैश्विक कीमतों में (कच्चे तेल जैसी) गिरावट हो रही है, परंतु वह इस तथ्य को छिपा देता है कि न्यून वैश्विक कीमतें न्यून वैश्विक मांग को प्रतिबिंबित करती हैं, जो सीधे तौर पर हमारे निर्यात को प्रभावित करती हैं। हमारे निर्यात इंजन को तेजी से बढ़ाना वर्तमान में एक बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही एक पृथक अमेरिका, प्रवासन विरोधी खतरों और वीजा निर्बंदों के खतरों  के ट्रम्प जनित खतरे भी जुड़े हुए हैं। यह भारत के हितों को गंभीर क्षति पहुंचा सकते हैं। भारी चुनावी सफलता एक वरदान साबित होती है (सरकार को साहसिक निर्णय लेने की दृष्टि से) या एक अभिशाप, (यदि परिणाम शीघ्र नहीं आते हैं) यह देखना अभी बाक़ी है।
  • प्रवृत्ति 5. वित्तीय समावेशन काम करता प्रतीत होता है
    • विमुद्रीकरण के कदम की भाजपा के प्रबुद्ध वर्ग को छोड़कर लगभग सभी विशेषज्ञों द्वारा आलोचना की गई। वैश्विक विशेषज्ञ (आईएमएफ, विश्व बैंक, इकोनॉमिस्ट इत्यादि) आश्चर्य व्यक्त करते रहे कि क्या वे इसके वास्तविक प्रभाव के प्रयोजन को देखने में नाकाम रहे हैं। परंतु वह अब भूतकाल का विषय हो गया है। वरिष्ठ नौकरशाहों ने फरवरी 2017 में ही घोषित कर दिया था कि “पुनःमुद्रीकरण की प्रक्रिया पूर्ण" हो चुकी है। 10 मार्च 2017 को जारी आरबीआई की रिपोर्ट ने विमुद्रीकरण की बहस को अंतिम रूप से यह कहकर समाप्त कर दिया है कि अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव तात्कालिक है जबकि इसके दीर्घकालीन प्रभाव सकारात्मक होंगे जैसे डिजिटलीकरण और अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिककरण। यदि हम विमुद्रीकरण और जन-धन योजना खातों को एकसाथ देखें तो एक स्पष्ट चित्र उभरकर आता है – भारत की वित्तीय व्यवस्था में हाशिये पर पड़े अनेक क्षेत्र अब मुख्यधारा में आ गए हैं। 

सरकारी योजनाओं और कानूनों से संबंधित कुछ ट्वीट देखें 







भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं की तुलना देखें :




३. भारत की विदेश नीति, सैन्य और रक्षा की स्थिति – २०१७-१८ 




भारत की रक्षा, सैन्य और विदेश नीति के मोर्चों पर अनेक गंभीर चुनौतियाँ हैं, जिनमें निश्चित ही एक पूर्ण-कालिक रक्षा मंत्री की नियुक्ति भी है!

इनके प्रति भारत के सात दशकों के अस्तित्व में दृष्टिकोण का एक सारांश यहाँ प्रस्तुत किया गया है

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    • गुटनिरपेक्षता का मार्ग
      • 1950 के दशक में भारत ने विश्व राजनीति के प्रति गुटनिरपेक्षता का मार्ग अपनाया। हमनें निर्णय किया कि हम न तो पश्चिम (पूंजीवादी) के गुट में रहेंगे और न ही साम्यवादी सोवियत गुट में। हम वैश्विक गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सदस्य बने। इसे दक्षिण-दक्षिण सहयोग आंदोलन भी कहा जाता था क्योंकि इसके अधिकांश सदस्य देश विकासशील देश थे।
    • वैश्वीकरण का उदय
      • 1980 के दशक तक शीत युद्ध (अमेरिका बनाम सोवियत संघ 1950 से 1991) का अंत होते-होते यह स्पष्ट हो गया कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पुनर्परिभाषित हो रही थी।अमेरिका के नेतृत्व वाला वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार का वैश्वीकरण अधिकाधिक बड़ा होता जा रहा था, और भारत भी वर्ष 1991 में समाजवादी एजेंडा का औपचारिक त्याग करके और उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (L P G) का स्वीकार करके इसका हिस्सा बन गया।
    • चीन का तीव्र कूच
      • चीन ने एक तीव्र परिवर्तन किया, और वर्ष 1979 तक जहाँ वह एक बंद अर्थव्यवस्था थी, वहीँ उसने “अमीर और संपन्न” बनने के प्रयास की घोषणा कर दी। करिश्माई नेता डेंग झियाओपिंग ने सुधारों के कठिन चरण में चीन का नेतृत्व किया, और चार दशकों के सुधारों के बाद आज चीन अमेरिका के आर्थिक अधिनायकवाद को चुनौती दे रहा है और यदि अमेरिका विश्व आर्थिक नेतृत्व से पीछे हटता है तो वह उसका स्थान लेकर नेतृत्व करने को तैयार है (वर्ष 2017 के विश्व आर्थिक मंच के दावोस सम्मेलन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग)।
    • भारत का पुनरुत्थान
      • वर्ष 1991 के बाद भारत ने तेजी से बदलती विश्व आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप स्वयं को ढाल लिया, या ढालने का प्रयास किया। हमारी अर्थव्यवस्था वस्तुओं और सेवाओं के लिए खोल दी गई और सभी तेजी से इसकी ओर आकर्षित हुए। हालांकि यह हमेशा सफल नहीं हुआ वैश्विक ब्रांड्स और कंपनियों ने भारत में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। हमारे सामान्य संपन्नता के स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगे।
    • भारत की पडोसी जटिलताएँ 
      • चीन की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के साथ ही उसकी प्रादेशिक महत्वाकांक्षाएँ बढ़ने लगीं। भारत के कट्टर शत्रु पाकिस्तान के साथ उसकी “सभी मौसमों की मित्रता” (All Weather Friendship) ने भारत द्वारा रिश्तों को जोड़ने और संबंधों को सामान्य बनाने के सभी प्रयासों को क्षति पहुंचाई है। हमारी कूटनीतिक और विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसियों के साथ संघर्षों को ख़त्म करने में व्यय हो रहा है।
    • हमारे सूचना प्रौद्योगिकी महानायक
      • भारत का सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र 1990 के दशक से तेजी से बढ़ा और 2000 के दशक के अंत तक यह वैश्विक परिदृश्य पर पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका था। हमारी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां बहुराष्ट्रीय हो गईं, जो नियमित रूप से करोड़ों डॉलर का लाभ अर्जित करने लगीं ! और इसका काफी श्रेय सरकार के न्यून हस्तक्षेप या कोई हस्तक्षेप नही की नीति को जाता है। इसके साथ ही विश्व स्तर पर अनिवासीय भारतीयों की संख्या में वृद्धि हुई, और यह बढ़ते-बढ़ते 2.25 करोड़ से अधिक (वर्ष 2015 के संयुक्त राष्ट्र के आंकडे) ऐसे लोगों की हो गई जो या तो अनिवासी भारतीय हैं या भारतीय मूल के हैं। इसने भारत के लिए एक नर्म शक्ति आधार (soft power base) का निर्माण किया।


भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ते आकार के बावजूद चीन हमसे भी अधिक तेजी से वृद्धि करता रहा और सांकेतिक दृष्टि से हम से 4 से 5 गुना अधिक बड़ा हो गया। विशाल निर्यात राजस्वों ने चीन को एक अति-विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (3 खरब डॉलर से अधिक) संचित करने में सहायता की, जिसका उपयोग अब वह एक पट्टा एक सड़क परियोजना के तहत संपूर्ण एशिया में अधोसंरचना परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए कर रहा है जिसकी भू-स्थैतिक महत्वाकांक्षाएँ अति-विशाल हैं। भारत नियमित रूप से इसके अनेक पहलुओं पर आपत्ति उठाता रहता है।

इन वर्षों के दौरान आतंकवाद की समस्या निरंतर रूप से बढती गई, जिसके तहत भारत के महानगरों (मुंबई 2008) और सैन्य ठिकानों पर प्रत्यक्ष हमले किये गए, जिसके परिणामस्वरूप भारत-पाक संबंधों में निरंतर गिरावट होती गई।

चीन और पाकिस्तान द्वारा प्रस्तुत दोहरी चुनौती के बीच भारत ने निरंतर रूप से परमाणु मिसाइल हथियारों और प्रौद्योगिकी आधारस्तंभ के निर्माण के क्षेत्र में निवेश जारी रखा, और हाल ही में उसने मिसाइल रक्षा कवच की क्षमता भी प्राप्त कर ली है। यह सब कुछ पड़ोसियों द्वारा किये जाने वाले संभावित दुष्प्रयोगों के विरूद्ध भारत की प्रतिरोधी  रणनीति का हिस्सा है।

वर्ष 2014 के बाद नई सरकार ने विदेश नीति की दिशा में एक नया, सकारात्मक और उत्साहजनक दृष्टिकोण शुरू किया है, जिसे  अब “मोदी सिद्धांत” कहा जाता है।


परंतु फ्री भी अभी तक 7 ऐसी चुनौतियाँ और अधूरे कार्य हैं जिनका समाधान प्राप्त करने के लिए भारत संघर्षरत है।



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भारतीय विदेश नीति के ७ अधूरे कार्य 



  1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सीट – इसके बिना संयुक्त राष्ट्र की अब निरर्थक दिखती भूराजनीतिक संरचना भारत को लगातार तकलीफ देती रहेगी। अपनी विशाल अर्थव्यवस्था और 1.35 अरब जनसंख्या के साथ भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट का किसी अन्य देश की तुलना में अधिक हक़दार है।
  2. आतंकवाद और उसपर विश्व शक्तियों का दोहरा रुख – भारत आतंकवाद का एक ऐतिहासिक रूप से पीड़ित देश रहा है। वर्ष 2016 की विश्व आतंकवाद सूची में दुर्भाग्य से हमारा स्थान शीर्ष दस देशों में है। शांति के लिए अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण के वर्षो के अथक प्रयास में सीमा-पार से होने वाले आतंकी हमले बाधा बन रहे हैं। लोकतांत्रिक परंपराओं के कारण भारत रूस या चीन जैसा (शिनजिआंग, २०१७) कड़ा रुख नहीं अपना सकता है।
  3. ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में विकसित होती बहुपक्षीय चुनौतियाँ – चीन ब्रिक्स को ब्रिक्स प्लस के रूप में विस्तारित करना चाहता है। भारत को डर है कि चीन के अनेक समर्थक देश  इसमें शामिल हो सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप इस समूह में भारत की वर्तमान स्थिति को धक्का पहुँच सकता है। साथ ही शंघाई सहयोग संगठन में भारत की सदस्यता मध्य एशिया में भारत की स्थिति को बेहतर बना सकती है।
  4. विश्व व्यापार संगठन का भंगुर ताना-बाना और भारत के कृषि मुद्दे – भारत जीएटीटी (GATT)  की स्थापना, और 1 जनवरी 1995 से विश्व व्यापार संगठन की स्थापना से ही इसका एक सकारात्मक सदस्य रहा है (चीन काफी बाद में इसका सदस्य बना)। हमने पहले व्यापार सुगमता अनुबंध (TFA) की भी पुष्टि कर दी है जो अंततः फरवरी 2017 में क्रियान्वित हो गया। हालांकि कृषि अनुव्रुत्तियों और डब्लूटीओ के नियमों के बारे में भारत की अनेक चिंताएं अभी भी अनसुलझी हैं।   
  5. क्षेत्रीय सहयोग और उभरती स्थिति – हिंद महासागर क्षेत्र पर निर्विवाद वर्चस्व भारत की रणनीति का मुख्य अंग है। इन्हें कमजोर करने के प्रयास अनेक देशों द्वारा किये जा रहे हैं, और आने वाले कुछ वर्षों के दौरान इस क्षेत्र में गतिविधि काफी तेज होने की संभावना है। साथ ही भारत अब अप्रासंगिक हो चुके दक्षेस का भी एक विकल्प निर्माण करने का प्रयास कर रहा है। 
  6. अमेरिका, रूस, चीन, जापान और भारत – भारत अमेरिका और रूस, दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखना चाहेगा, और ट्रम्प प्रशासन की रूस के साथ हाल की घनिष्ठता भारत को काफी लाभ पहुंचा सकती है। हालांकि इस विषय पर अभी काफी अनिश्चितता है। मोदी सिद्धांत को इस निरंतर फिसलती जमीन की दृष्टि से विकसित करना होगा। निरंतर रूप से विस्तार करने वाले चीन से जापान के लिए खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है इसलिए वह अमेरिका और भारत, दोनों के साथ लगातार घनिष्ठता बढ़ा रहा है, जिसके कारण चीन हताश और अधिक आक्रामक होता जा रहा है।   [ Running Updates on Donald Trump related news ] 
  7. विश्व व्यापार की स्थिति – ये सभी स्थितियां समग्र रूप से विश्व आर्थिक स्थिति को कमजोर बना रही हैं। जबकि 1950-1990 की अवधि में दो स्पष्ट गुट थे जो एक दूसरे पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए प्रयासरत थे, वहीँ 1990 के बाद की स्थिति न तो सही मायनों में एक-ध्रुवीय है और न ही बहु-ध्रुवीय है। इसके कारण स्थितियां किसी के लिए भी आसान नहीं रह गई हैं। भारत की वृद्धि आवश्यकताओं के लिए एक खुले विश्व की आवश्यकता है जो उसकी वस्तुओं और मानव शक्ति को सफल होने के लिए बेहतर अवसर प्रदान कर सकती है। 

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2017 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने जो स्पष्ट संदेश दिया है उसे समग्र वैश्विक परिदृश्य के तहत देखना होगा। भारत अपार संभावनाओं, उभरते युवाओं, और अपार अधूरी संभावना से भरा हुआ देश बना हुआ है। राजनीति और अर्थशास्त्र के सही मिश्रण से भारत विश्व अर्थव्यवस्था का चमकता सितारा बन सकता है, जो उसके 1.35 अरब नागरिकों के लिए संपन्नता लाएगी। केवल सकारात्मक राजनीति ही परिणामकारक हो सकती है, और यह इस बात पर निर्भर होगा कि हम एक आकाँक्षाओं से भरे देश की बात किस प्रकार सुनते हैं कि वास्तव में उन्हें क्या चाहिए।





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प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध कुछ आरोप 



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध उनके विरोधियों द्वारा समय-समय पर विभिन्न आरोप लगाए जाते रहे हैं। इन आरोपों की एक आंशिक सूची यहाँ दी गई है :


  1. वे एक निगम समर्थक (प्रो-कॉर्पोरेट) प्रधानमंत्री हैं, और वे सूट-बूट की सरकार चलाते हैं (यह विशिष्ट रूप से  कांग्रेस की पंचलाइन है)। 
  2. वे प्रधानमंत्री कार्यालय में शक्ति का संकेंद्रण करके भारतीय राजनीति की संघीय संरचना को नष्ट कर रहे हैं (यह तृणमूल कांग्रेस पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों द्वारा लगाया जाने वाला विशिष्ट आरोप है)। 
  3. वे अल्पसंख्यकों और उनके विचारों का विरोध करने वाले लोगों के प्रति असंवेदनशील हैं (यह आरोप जेएनयू की आज़ादी ब्रिगेड और कुछ अन्य अति-उदारवादी समूहों द्वारा लगाया गया आरोप है) । 
  4. हाल के चुनावों में अन्य धर्मों के लोगों को टिकट नहीं देकर उन्होंने टिकटों का लोकतांत्रिक वितरण सुनिश्चित नहीं किया है, क्योंकि भाजपा ने 2017 के हाल के उ.प्र. चुनावों में किसी भी गैर-हिंदू प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया (यह एक ऐसा तथ्य है जिसका उपयोग सभी विरोधी दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान किया)। 
  5. वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रभाव के तहत कार्य करते हैं, जिसने भारत के शासन की गतिकी को परिवर्तित करना शुरू कर दिया है (शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले अनेक लोगों द्वारा यह आरोप लगाया जाता है)। 
  6. विदेश नीति के प्रति उनके दृष्टिकोण में सातत्य का अभाव है, और वे अपनी व्यक्तिगत उर्जा पर ही अत्यधिक निर्भर रहते हैं, यहाँ तक कि उन्होंने विदेशमंत्री को भी अलग-थलग कर दिया है (लगभग सभी विरोधी दलों द्वारा लगाया गया आरोप)। 
  7. विशेषज्ञों की उचित सलाह के बिना वे अपने अकेले के दम पर एकतरफा कट्टरपंथी निर्णय लेते हैं (इसका संबंध विमुद्रीकरण के निर्णय से है) (एक ऐसा आरोप जो 8 नवंबर 2016 के बाद लगातार दोहराया जाता रहा है)।  
  8. उनकी चुनावी विजयों के कारण वे अपने आपको अजेय मानने लगे हैं, परंतु वे लोगों के दिल जीतने में असफल रहे हैं (चुनाव परिणामों के बाद किये गए अनेक ट्वीट)
  9. वे उपदेश तो काफी करते हैं परंतु स्वयं उन उपदेशों का पालन नहीं करते हैं। वे केवल एक सपने दिखाने वाले व्यापारी हैं (आलोचकों का एक मिश्रण)
  10. वे स्वयं (और भाजपा) किसी भी कीमत पर सत्ता हथियाना चाहते हैं, एक प्रमुख उदाहरण के रूप में हाल का गोवा का उदाहरण दिया जाता है। 
[गोवा का मामला : कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। मामला भारत के सर्वोच्च न्यायालय में गया। यह इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि गोवा का भारत की राजनीति पर कोई बहुत बड़ा प्रभाव होने वाला था, बल्कि यह इसलिए महत्वपूर्ण था कि अपने गृह राज्य की सत्ता संभालने के लिए रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर ने अपने पद से त्यागपत्र दिया, इसी स्थान से उन्हें वर्ष 2014 में केंद्र में लाया गया था]

ये रहे मोदी पर लगे आरोपों को दर्शाते कुछ ट्वीट्स


















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२०१६ में राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा दिए गए हिंदुओं और मोदी पर कुछ व्यक्तव्य 

मूल अंग्रेजी में

I am a big fan of Hindu. I am a big fan of India.

If I am elected President, the Indian and Hindu community will have a true friend in the White House. That I can guarantee you.

Narendra Modi is a great man. I applaud him. He has energetically reformed India’s bureaucracy.

Generations of Indians and Hindu Americans have enriched our country (America).

You can’t allow policies that allows businesses (from India, Japan, Vietnam, China, Mexico) to rip businesses from American like candy from a baby.



हिंदी में अनुवादित 

मैं हिंदुओं का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ। मैं भारत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ 

यदि मैं राष्ट्रपति चुन लिया गया, भारतीय और हिंदू समुदाय का व्हाइट हाउस में एक सच्चा मित्र होगा। यह बात में आपको निश्चित आश्वासन दे सकता हूँ 

नरेंद्र मोदी एक महान व्यक्ति हैं। मैं उनकी सराहना करता हूँ। उन्होंने उर्जावान तरीके से भारतीय नौकरशाही को बदल दिया है 

भारतीयों और हिंदुओं की पीढ़ियों ने हमारे देश (अमेरिका) को समृद्धि प्रदान की है   

आप ऐसी नीतियों की अनुमति नहीं दे सकते जो उन व्यापारों (भारत, जापान, वियतनाम, चीन, मेक्सिको से) को अमेरिकियों के व्यापारों को छीनने की अनुमति देते हैं, जैसे किसी बच्चे से कैंडी छीन ली जाए 




भारतीय आईटी उद्योग द्वारा, और अमेरिका में भारतीय-अमेरिकियों को जिन चुनातियों का सामना करना पड़ रहा है (नस्लीय हमले), अब ये प्रधानमंत्री मोदी के लिए कड़ी परीक्षा होगी कि वे ट्रम्प प्रशासन के साथ मधुर संबंध बनाते हुए भारत हेतु छूट प्राप्त करें। ऐसे करने में विफल रहने पर सरकार की साख पर तो चोट लगेगी ही, साथ की भारतीय-अमेरिकी समुदाय से मिलने वाले प्रेम पर भी जिसने उनकी इतनी मदद की है।




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भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति : '17-18
भारत एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। प्रस्तुत है हमारा विस्तृत विश्लेषण
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