सहयोगी संघवाद - एक घुमावदार राह

बड़े सुधार लागू करने हेतु, भारत में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगी संघवाद की आवश्यकता है

एकता से शक्ति, मतभेद से बिखराव 

विश्व भर में जब से लोकतंत्र के आधुनिक स्वरुप में आकार लिया है, तभी से राज्य और उसके शासन संरचना के संबंध में केन्द्रीय प्रश्न यही रहा है कि केंद्रीकरण करें या नहीं?

इस प्रश्न के विभिन्न उत्तरों का परिणाम हम विश्व भर के देशों और उनके शासन तंत्रों में देख सकते हैं। कनाडा के सरलता से जुड़े हुए परिसंघ से लेकर अमेरिका की संघीय संरचना तक फैले हुए वर्णपट में, हम भारतीय प्रारूप भी देखते हैं जो अर्ध-संघीय स्वरुप लिए हुए लगभग एकात्मक (unitary) होने की सीमा पर है। इन सभी प्रारूपों को बांधने वाला प्रमुख विचार है नागरिकों की दृष्टि से शासन की कुशलता (efficiency) और प्रभावशीलता (effectiveness)। 


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संघवाद पर केंद्रण 

एक राजनीतिक तंत्र के रूप में संघवाद मिश्रित-शासन के स्वरुप पर आधारित है जिसमें केंद्रीय और राज्य /क्षेत्रीय सरकारें साथ-साथ काम करती हैं।  इसमें सरकारों के दोनों स्तरों पर शक्तियों और अधिकारों का विशिष्ट विभाजन होता है, और जब दोनों के बीच कोई विवाद की स्थिति निर्मित होती है तब देश का सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या की आवश्यकता के अनुरूप मामलों को सुलझाता है।

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    • भारत संघात्मक है या एकात्मक?
      • तकनीकी दृष्टि से भारत एक संघीय राज्य नहीं है। हमें एक अर्ध-संघीय (Quasi-federal) राज्य के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसका झुकाव एकात्मकता की ओर है। परंतु चूंकि हमारे यहाँ २९ राज्य और एक सशक्त केंद्र सरकार विद्यमान हैं, और चूंकि सरल अभिव्यक्ति संवाद को आसान बनाती है अतः वर्तमान समय में "संघवाद" (federalism) शब्द का प्रयोग राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आम है।


इस मुद्दे पर भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पी डॉ. आंबेडकर का क्या कहना था?

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    • “इतिहास दो प्रमुख प्रकार के संविधानों को पहचानता है - एक जिसे एकात्मक कहते हैं और दो जिसे संघीय कहा जाता है। किसी एकात्मक संविधान की दो विशेषताएं होती हैं (१) केंद्रीय राज की प्रमुखता और (२) सहायक संप्रभु राजों का अभाव। इसके विपरीत, एक संघीय संविधान में (१) एक केंद्रीय राज होता है और साथ ही सहायक राज भी होते हैं, और (२) अपने-अपने क्षेत्रों में दोनों ही संप्रभु होते हैं। 
    • दूसरे शब्दों में, संघ का अर्थ है एक द्वैत हुकूमत (दोहरे राज) की स्थापना। मसौदा संविधान उतना ही संघीय है जितना कि एक द्वैत राज स्थापित करने हेतु होना चाहिए। इस प्रस्तावित संविधान में द्वैत हुकूमत के तहत केंद्र में केंद्र सरकार होगी और परिधि में राज्य सरकारें होंगी जिनके पास वे संप्रभु शक्तियां होंगी जिनका उपयोग वे संविधान द्वारा निर्दिष्ट क्षेत्रों में कर सकेंगी।"

संघीय पांडित्य के शब्द 


संघ सरकार के कार्य युद्ध और खतरों के दौरान बड़े गहरे और व्यापक होंगे; राज्य सरकारों के कार्य शांति और सुरक्षा के माहौल में   -  जेम्स मैडिसन, अमेरिका के पितृ-पितामह और राष्ट्रपति (१८०९ - १८१७)

संघ की इकाइयों को काफी स्वायत्तता दी जाएगी। अब, संघीय संविधान संघ विषयों और समवर्ती मामलों से जुड़ा रहेगा। तो राज्य के मामलों का जहाँ तक प्रश्न है, राज्य उस हेतु संप्रभु होंगे   - पंडित नेहरू, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री

संघवाद अब केंद्र-राज्य संबंधों की फॉल्ट-लाइन (तड़कन रेखा) न रहते हुए टीम इंडिया नमक एक नई भागीदारी की परिभाषा बन चुका है   -  नरेंद्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री


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भारतीय तंत्र की ख़ास विशेषताएँ ये हैं 

भारत जैसे विशाल और विविध देश में लचीलापन और दृढ़ता दोनों ही एक साथ आवश्यक हैं। आधुनिक गणतंत्र के जन्म से ही, हमारे संविधान निर्माताओं ने इसका प्रयास किया।

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    • एक मजबूत केंद्र की आवश्यकता 
      • हमारे संविधान निर्माताओं ने इस तथ्य को मान्य किया कि एक सशक्त केंद्र देश की आवश्यकता है क्योंकि १९५० के दशक के भारत को तब तक विभिन्न टुकड़ों में विभाजित हो जाने खतरा था जब तक कि उन्हें एक बनाए रखने के लिए एक मजबूत और शक्तिशाली केंद्र शासन नहीं होता।
    • "संघीय स्वतंत्रताओं" की आवश्यकता 
      • चूंकि भारत एक विशाल विविधताओं का देश है अतः कोई एकल बल कभी भी इसे बांध कर रख पाने में, और साथ ही नागरिकों को खुश रख पाने में अक्षम रहेगा। विकेंद्रीकरण अनिवार्य है। नीति आयोग (NITI Aayog) का निर्माण इस दिशा में उठाया गया एक कदम माना जा सकता है।
    • मजबूत रूपरेखा
      • यदि एक स्पष्ट-रूप से परिभाषित रूपरेखा नहीं होगी तो इन बलों में परस्पर  टकराव होने की संभावना है। हमारा संविधान ही वह रूपरेखा है।
    • एक शक्ति-संपन्न मध्यस्थ 
      • सर्वोच्च न्यायालय एक प्रहरी के रूप में खड़ा है जो जटिल संघीय विवादों के निराकरण में सहायता करता है। हालांकि अभी तक दुःसाध्य विवाद अपेक्षाकृत कम ही उभरे हैं।

आर्थिक उदारीकरण और भारत का उन्मुक्तिकरण 

वर्ष १९९१ से, केंद्र सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था में मूलभूत सुधार करने का निर्णय लिया। उदारीकरण के इन बलों ने प्रपाती प्रभावों को गतिमान बनाया, जो हालांकि सकारात्मक थे परंतु इनका परिणाम राज्य स्तर पर शासन की आवश्यकताओं में परिवर्तन के रूप में हुआ। अधिक उद्यमी स्वतंत्रता की आवश्यकता थी, और जैसे-जैसे अंतर-राज्य व्यापार और वाणिज्य बढ़ना शुरू हुआ वैसे-वैसे एक ऐसी कानूनी रूपरेखा की आवश्यकता महसूस होने लगी जो इस प्रवाह को बाधित करने की बजाय उसके लिए सहायक हो। इसी के साथ उन संवैधानिक संशोधनों के अधिनियमन ने जिन्होंने पंचायती राज को शासन का एक अनिवार्य अंग बनाया, उन्होंने देश भर के गाँव और जिले के स्तर पर विशाल बलों को गतिमान बनाया। 'भारतीय राजनीति की बदलती प्रवृतियों' विषय पर एक बोधि में हमने इसका परिक्षण किया है। [ ##eye## पढ़िए वो बोधि यहाँ]  

इसके कारण आज हमें केंद्र-राज्य संबंधों में जो बहुविध संघर्ष दिखाई देते हैं उनकी शुरुआत हुई।


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    • इनके कुछ उदाहरण निम्नानुसार हो सकते हैं : ##chevron-right## योजना आयोग जब योजना आयोग अस्तित्व में था उस समय दक्षिणी राज्यों की अक्सर यह शिकायत रहती थी कि निधि आवंटन में उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है, जो प्रमुख रूप से राज्य की जनसँख्या के आकार को ध्यान में रखता था। उनका तर्क होता था कि "हमें अपनी जनसंख्या नियंत्रित रखने के लिए दण्डित किया जा रहा है!  ##chevron-right## केंद्रीय योजनाएं विशाल केंद्रीय योजनाएं विवाद का एक अन्य कारण बनीं, और इसमें योजनाओं की ब्रांडिंग एक बड़ा मुद्दा थी। जब केंद्रीय बजट का आकार बढ़ता रहा तब ऐसी योजनाएं जो सामान्य नागरिकों के जीवन को छूने वाली थीं – चाहे वह महामार्ग हों या मनरेगा या सार्वजनिक वितरण व्यवस्था (पीडीएस) –उनका आकार बढाया गया। 
    • ##chevron-right## गठबंधन सरकारें केंद्र में जब गठबंधन सरकारों का शासन था उस समय अनिवार्य रूप से काफी विकेंद्रीकरण हुआ। परंतु जैसे ही केंद्र में बहुमत की सरकार स्थापित हुई वैसे ही समस्याएँ उभरना शुरू हो गईं। ##chevron-right## आंतरिक व्यापार और वाणिज्य व्यापार-वाणिज्य  प्रभावित करने वाली अत्यंत जटिल संरचनाओं के परिणामस्वरूप  सरलीकरण की मांगें निरंतर रूप से उठने लगीं। किन्तु जीएसटी शासन को अस्तित्व की शुरुआत करने में लगभग एक दशक का समय लग गया। भारत में काम करवाने में इस प्रकार की जटिलताएँ विद्यमान हैं। 

इस समस्या के और अधिक बढने का कारण है प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति (competitive politics)। राजनीतिक दल राज्यों में अक्सर होने वाले चुनावों में प्रतिस्पर्धा करते हैं, और इस कारण केंद्रीय स्तर पर भी निर्णय प्रक्रिया या तो गतिमान या प्रतिकूल प्रभावित हो सकती है, और यह इस बात पर निर्भर होता है कि किस प्रकार के गठबंधन निर्माण होते हैं।

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    • ##thumbs-o-up## टीम इंडिया - एक हकीकत बनना
      • वर्तमान सरकार ने नीति आयोग की बैठकों के दौरान "टीम इंडिया" जैसे शब्दों के इस्तेमाल, या निर्णय लेने के प्रमुख अधिकारों वाली सर्व-समावेशी जीएसटी परिषद के निर्माण, इत्यादि जैसे सरल संकेतों के माध्यम से उल्लेखनीय समझदारी का परिचय दिया है। सौभाग्य से वित्त आयोग (Finance Commission) जैसी संस्थाएं विद्यमान हैं जिसने अपनी १४ वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की कि राज्यों का केन्द्रीय कर राजस्व संग्रहण में अधिक हिस्सेदारी का अधिकार होना चाहिए


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सहयोगी संघवाद
(cooperative federalism)

अतः हमनें देखा कि शासन की संघवाद की व्यवस्था एक यौजिक (compound) राजनीतिक व्यवस्था है। सहकारी संघवाद वह दृष्टिकोण है जिसमें राष्ट्रीय और राज्य सरकारें साझा समस्याओं को सुलझाने के लिए परस्पर सहयोग करती हैं। सहकारी संघवाद के सफल परिचालन के लिए शक्तियों का एक संघीय संतुलन निर्मित करना आवश्यक है।

सैद्धांतिक दृष्टि से सहकारी संघवाद की परिकल्पना अच्छी प्रतीत होती है। परंतु एक वास्तव में कार्यशील सहकारी संघीय व्यवस्था बनाना एक कठिन कार्य है। संघीय व्यवस्था के विभिन्न हितधारकों के बीच विवाद और प्रतिस्पर्धा  मामले को और अधिक जटिल बनाती हैं, जैसा हम पूर्व में देख चुके हैं। ये समस्याएँ विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में विद्यमान विशाल सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और यहाँ तक कि सांस्कृतिक और विकासात्मक विविधताओं और असमानताओं के कारण उभरती हैं। इन्हें एक-जैसी स्थितियां उपलब्ध नहीं हैं।

सहकारी संघवाद भारत में चलाना कठिन क्यों है - कारणों की सूची :

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    • विविधताओं और असमानताओं का संजाल 
      • विविधताओं और असमानताओं के कारण भिन्न-भिन्न महत्वाकांक्षाएं और आकांक्षाएं निर्मित होती हैं। इन सभी को पहचानना और उन्हें हल करना, और सभी राज्यों को एक मंच पर लाना एक चुनौतीपूर्ण काम है। अभी तक तो भारत में यह नहीं हो पाया है।
    • स्वस्थ प्रतियोगिता
      • राज्यों के केवल आकार में ही भिन्नता नहीं है बल्कि उनमें संसाधनों की उपलब्धता में भी भिन्नता है। सहकारी संघवाद को सफलतापूर्वक क्रियान्वयित होने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता का वातावरण निर्मित करने की आवश्यकता है। वे बिंदु जहाँ यह स्वस्थ प्रतियोगिता लोकलुभावनवाद (populism) में परिवर्तित हो जाती है वे खतरनाक हैं। 
    • अकेला चना ... 
      • केंद्र को हमेशा ही राज्यों के सहयोग की आवश्यकता पड़ेगी क्योंकि केन्द्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन का भाग राज्यों पर होगा।
    • खंडित राजनीति
      • भारत के खंडित राजनीतिक परिदृश्य के कारण भी सहकारी संघवाद का क्रियान्वयन कठिन होगा।

नागरिक सर्वप्रथम 

बोधि बूस्टर मानता है कि सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद के बीच संतुलन स्थापित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। संविधान के अनुसार शक्तियों का विभाजन प्रतिस्पर्धी के बजाय अधिक सहकारी राज्यों का सुझाव देता है। परंतु राजनीति की वास्तविकता अच्छे इरादों के बावजूद स्वस्थ संवाद को रोकता है। चुनावी मजबूरियों के कारण श्रेष्ठ परिवर्तनवादी योजनाओं का भी बुनियादी मुद्दों पर विरोध हो सकता है – जैसे इसे केवल "प्रधानमंत्री जन-धन योजना" के बजाय "प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जन-धन योजना" क्यों न कहा जाए!

इसी विवाद ने नवम्बर २०१६ में किये गए विमुद्रीकरण को भी जकड़े रखा है, और कुछ मुख्यमंत्री एक तथा-कथित "एकात्मक और एकपक्षीय निर्णय" के विरूद्ध खड़े हो गए हैं जिसने स्थानीय स्तर पर आजीविकाओं को खतरे में डाल दिया है जिसका उनके पास कोई जवाब या समाधान ही नहीं है।

आज भारत एक दोराहे पर खड़ा है। विशाल युवा जनसंख्या जीवन की मूलभूत समस्याओं का त्वरित हल चाहती है। राजनीतिक वर्गों को यह करना होगा इससे पहले कि यह जनसांख्यिकी लाभांश किसी जनसांख्यिकी विनाश में परिवर्तित हो जाए।

सबसे वृहद् दर्शन 


www.BodhiBooster.com, http://hindi.bodhibooster.com, www.SandeepManudhane.org, www.PTeducation.comविश्व के भविष्य हेतु शांति, सुरक्षा और व्यवस्थित प्रगति हेतु समय की मांग है कि स्वतंत्र देशों का एक विश्व संघ बने जो अपने सदस्यों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हुए, किसी एक द्वारा दूसरे के प्रति आक्रामकता और शोषण रोके, राष्ट्रीय मंत्रालयों (हितों) की रक्षा करे, पिछड़े इलाकों और लोगों को आगे बढ़ाये, और विश्व के संसाधनों को  सबके हित हेतु इस्तेमाल करे    - महात्मा गाँधी, १९४२ में कांग्रेस प्रस्ताव में  [ The future peace, security and ordered progress of the world demand a world federation of free nations that ensures the freedom of its constituent nations, the prevention of aggression and exploitation by one nation over another, the protection of national ministries, the advancement of all backward areas and peoples, and the pooling of the world's resources for the common good of all ]



नीचे दी गई कमैंट्स थ्रेड में अपने विचार ज़रूर लिखियेगा (आप आसानी से हिंदी में भी लिख सकते हैं)। इससे हमें प्रोत्साहन मिलता है।

[बोधि प्रश्न हल करें ##pencil##]

  • [message]
    • बोधि कडियां (गहन अध्ययन हेतु; सावधान: कुछ लिंक्स बाहरी हैं, कुछ बड़े पीडीएफ)
      • ##chevron-right## आंबेडकर और संघवाद - एक विस्तृत अध्ययन यहाँ  ##chevron-right##  आंबेडकर पर राज्य सभा प्रकाशन - पी.डी.एफ. यहाँ  ##chevron-right## संघवाद पर एन.सी.इ.आर.टी. का पी.डी.एफ. यहाँ  ##chevron-right## गाँधी के संघवाद पर विचार - विस्तृत विश्लेषण यहाँ  ##chevron-right## मोदी सरकार की आलोचना यहाँ ##chevron-right## भूमि अधिग्रहण से जन्मे केंद्र-राज्य संबंधों के तनाव यहाँ

[अंग्रेजी में पढ़ें Read in English]  [आप के लिए कुछ प्रेरणास्पद! ##heart-o##]  [सारगर्भित बोधि खबरें ]

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