भारतीय आर्थिक परिदृश्य 2016-17

Indian economy outlook, RBI, SEBI, fiscal deficit

यदि रोजगार के आंकडों के माध्यम से देखा जाये तो भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। कमजोर सिंचाई विस्तार के कारण भारत की अधिकांश कृषि वर्षा पर निर्भर है, और एक कमजोर मानसून व्यापक रूप से अर्थव्यवस्था पर एक नकारात्मक प्रभाव डालता है। आमतौर पर मुद्रास्फीति में वृद्धि होती है जो खाद्यान्नों की ऊँची कीमतों के रूप में प्रतिबिंबित होती है, जिसके परिणामस्वरूप भावनाएं आहत होती हैं और इससे व्यय में कमी आने की संभावना बन जाती है। यदि फसलें नष्ट होती हैं तो खाद्यान्नों के आयात का विदेशी मुद्रा भंडारों पर भी प्रभाव पडता है। समग्र आर्थिक परिदृश्य कठिन हो जाता है, और अनेक कारणों से वर्ष 2016-17 का परिदृश्य ऐसा ही है। 

व्यय का, चाहे वह निजी व्यय हो या सरकारी व्यय,  आर्थिक भावनाओं पर समग्र रूप से प्रभाव पडता है। 

कमजोर मानसून के कारण वर्ष 2015 भारतीय कृषि की दृष्टि से अधिक लाभदायक नहीं रहा। इसीलिए हमारी वर्ष 2016 की शुरुआत कुछ हद तक सुस्त रही। पहली तिमाही की वृद्धि दर मध्यम थी। अर्थव्यवस्था में अपेक्षित 7 प्रतिशत से कम की दर पर वृद्धि हुई। परंतु बढे हुए सरकारी व्यय और बढे हुए स्थिर निवेश के कारण मंदी में कुछ हद तक सुधार हुआ, परंतु निजी उपभोग में कमी आई। दूसरी तिमाही में, पहली तिमाही में अनुभव की गई कमजोरी कुछ हद तक कम हुई और विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के पीएमआई में अगस्त 2016 में वृद्धि हुई। एक निजी सर्वेक्षण दर्शाता है कि अगस्त में भारत की विनिर्माण गतिविधि में पिछले बारह महीनों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज हुई। अगस्त में विनिर्माण क्षेत्र के विक्रय में वृद्धि हुई जिसमें ऑटोमोबाइल क्षेत्र की बिक्री दो अंकों में पहुँच गई।

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ये प्रवृत्तियां पहली तिमाही की अल्प वृद्धि दर में व्युत्क्रम के संकेत प्रदान करती हैं सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार बढे हुए वेतन के भुगतान और शेष राशि के भुगतान ने भी बढे हुए  निजी उपभोग की उम्मीद पैदा की है। सौभाग्य से वर्ष 2016 मानसून की दृष्टि से व्यापक रूप से अच्छा रहा है जिसके कारण कृषि क्षेत्र में उत्साह का वातावरण है। 

भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत पक्ष 

विश्व अर्थव्यवस्था की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में निरंतर रूप से जारी मंदी की स्थिति की दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन संतोषजनक कहा जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल मजबूत पक्ष हैं (ए) अनुकूल जनसांख्यिकी, (बी) वैश्वीकरण और आउटसोर्सिंग से लाभ प्राप्त करने की क्षमता, (सी) वृद्धि दर की दृष्टि से सकारात्मक अनुमान, (डी) अर्थव्यवस्था का विविधिकरण, और (ई) श्रम सघन उद्योगों में विशाल प्रतिस्पर्धात्मक लाभ (जो अब कम होता जा रहा है)। 

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    • ##fa-thumbs-o-up## भारत ने ३०० अरब डॉलर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का आंकड़ा छुआ (अप्रैल २००० से सितंबर २०१६)
      • २१ वीं सदी में भारत दुनिया में एक भरोसेमंद निवेश गंतव्य के रूप में उभरा है! भारत में अप्रैल २००० से सितंबर २०१६ तक ३०० अरब अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया है। इससे पता चलता है कि भारत वैश्विक आर्थिक संकट के बीच सुरक्षित निवेश स्थल बना हुआ है। इसमें से करीब ३३ प्रतिशत एफडीआई भारत में मॉरीशस के रास्ते आया है।  इसके पीछे अहम कारण है भारत का मॉरीशस के साथ दोहरा कराधान बचाव करार। हालाँकि विश्लेषक कहते हैं कि इसका कुछ हिस्सा धन-शोधन से भी आया है। किन्तु ये भारत में आर्थिक गतिविधियों के लिए एक बेहद बढ़िया खबर है, विशेषतौर पर निकट-अवधि में ०८ नवम्बर पश्चात की नोटबंदी के चलते।


एफ.डी.आई. के आंकड़े औद्योगिक नीति संवर्धन विभाग (डी.आई.पी.पी.) के अनुसार देखें 

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कमजोरियां और चुनौतियाँ 

आरबीआई, सेबी जैसी मजबूत स्वतंत्र संस्थाएं  और सरकार का सकारात्मक दृष्टिकोण भी व्यवस्था के लिए सहायक है। फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी कुछ चुनौतियों का सामना कर रही है जैसे (ए) बढती मुद्रास्फीति, (बी) कमजोर अधोसंरचना, (सी) अकुशल श्रम बल, (डी) ऋणात्मक भुगतान संतुलन, (ई) उच्च बजट घाटे, (एफ) उच्च स्तरीय निजी ऋण, और (जी) व्यापक आर्थिक असमानताएं। इनमें से अनेक संरचनात्मक हैं जो इस सत्य को स्पष्ट करती हैं कि इन्हें हल करने के लिए एक दीर्घकालीन दृष्टिकोण आवश्यक है। 

सरकार परिवर्तन के प्रति सकारात्मक है। परंतु भारत जैसे महाकाय देश में चीजें अत्यंत धीमी गति से चलती हैं। सरकार द्वारा किये गए बहुविध उपायों के साथ परिदृश्य बदल रहा है और यह विभिन्न अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दरों के संबंध में की गई भविष्यवाणियों में प्रतिबिंबित होता है। ये सभी इस बात की ओर संकेत देते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक तेजी से बढेगी।

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    • काले धन पर युद्ध की घोषणा
      • ०८ नवंबर २०१६ को प्रधानमंत्री मोदी ने काले धन पर युद्ध छेड़ दिया। कई वर्षों से चल रही इस लड़ाई में उन्होंने अचानक से वर्तमान में मान्य रु.५०० और रु.१००० के नोटों को अमान्य घोषित करते हुए काले धन के कुबेरों को असहाय कर दिया। इसका गहरा प्रभाव आने वाले वर्षों में दिखेगा।  [आप इसपर यहाँ और पढ़ सकते हैं  ##link##]

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हाँ, हम विश्व की सबसे तेजी से बढने वाली अर्थव्यवस्था हैं ! हालांकि कुछ विशेषज्ञों को इस विषय में संदेह है कि जीडीपी की बदली हुई गणना पद्धति वास्तविक सत्य को प्रतिबिंबित करती है या नहीं, परंतु ये आंकडे आधिकारिक हैं और इन्हें स्वीकार करना चाहिए। 

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    • बोधि कडियां (गहन अध्ययन हेतु; सावधान: कुछ लिंक्स बाहरी हैं, कुछ बड़े पीडीएफ)
      •  ##chevron-right## वित्त मंत्रालय भारत सरकार - आर्थिक दृष्टिकोण 2016-17 पीडीएफ यहाँ  ##chevron-right## आरबीआई मौद्रिक नीति विवरण अगस्त 2016 यहाँ  ##chevron-right## सीएमआईई अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष रिपोर्ट (सितंबर 2016) यहाँ ##chevron-right## विमुद्रीकरण के बाद क्या? यहाँ  ##chevron-right## एफ.डी.आई. पर के आंकड़े पी.डी.एफ. यहाँ 

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