भारत में साक्षरता और शिक्षा व्यवस्था

सभी के लिए शिक्षा एक विकसित, सभ्य समाज की महत्वपूर्ण विशेषता है। एक समाज का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी आने वाली पीढी को किस...

सभी के लिए शिक्षा एक विकसित, सभ्य समाज की महत्वपूर्ण विशेषता है। एक समाज का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी आने वाली पीढी को किस प्रकार की शिक्षा प्रदान कर रहा है ताकि वह न केवल उभरते विश्व में स्वयं को अनुकूल बना सके बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विश्व को किस प्रकार से प्रभावित कर सके। वास्तव में शिक्षा और साक्षरता बहुविध तरीकों से एक व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व को आकार दे सकते हैं।

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भारत राज्यों का एक संघ है, अतः इसके 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में साक्षरता और शिक्षा के स्तर भिन्न-भिन्न हैं। केरल को सर्वाधिक साक्षर राज्य माना जाता है, जहाँ साक्षरता की दर 93 प्रतिशत से अधिक है, वहीं 63 प्रतिशत साक्षरता के साथ बिहार को न्यूनतम साक्षर राज्य माना जाता है। अन्य सभी राज्य इनके बीच आते हैं और यहाँ इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि आंकडे दिखाने के बजाय छिपाते अधिक हैं।

साक्षरता और शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ यह है कि हम उन लोगों को शिक्षित और साक्षर मानें जो पढ-लिख सकते हैं और संख्याओं को समझते हैं? क्या हम ऐसे व्यक्ति को शिक्षित मान सकते हैं जिसने विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर विभिन्न विषयों और पाठ्यक्रमों का अध्ययन किया है? यदि आप अपनी शिक्षा को विश्व के साथ व्यवहार करते समय या अपने व्यावसायिक जीवन उपयोग करने में असमर्थ हैं तो आपकी शिक्षा का कोई अर्थ है?

दुनिया तेजी से बदल रही है। प्रतिदिन नई प्रौद्योगिकियां विकसित हो रही हैं और कल्पना से परे हमारे जीवन को प्रभावित कर रही हैं।  प्रत्येक बीतते दिन के साथ विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में अभिनव नवप्रवर्तन हो रहे हैं। शिक्षा का आधुनिक और विश्वसनीय पैमाना यह होना चाहिए कि शिक्षित व्यक्ति कितनी अच्छी तरह से और कितनी तेजी से बदलते विश्व परिदृश्य के साथ अपने आपको समायोजित करता है और अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन  के विकास के लिए और अपने समाज की विकास की आवश्यकताओं के लिए इन्हें आत्मसात करता है। ईमानदारी से कहें तो लगभग सभी देश बदलते परिदृश्य के अनुरूप अपनी औपचारिक प्रक्रियाओं के अद्यतन में चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।


समय समय पर की जाने वाली विभिन्न समीक्षाएं और रिपोर्ट्स दर्शाती हैं कि भारतीय शिक्षा उभरती विश्व उद्योग आवश्यकताओं से काफी पीछे है। भारत के 30 प्रतिशत से भी कम प्रबंधन और अभियांत्रिकी स्नातक सीधे
रोजगार के योग्य हैं। तो क्या प्रति वर्ष शिक्षित होकर निकलने वाले 70 प्रतिशत से अधिक युवाओं को अर्थपूर्ण ढंग से शिक्षित माना जा सकता है? समय समय पर समाचार पत्रों में पढने को मिलता है कि चपरासी जैसे निम्न स्तर के रोजगार के लिए भी उच्च शिक्षित युवा बडी संख्या में आवेदन करते हैं। हालांकि इसमें दो राय नहीं है कि इस स्थिति का एक बडा कारण देश में व्याप्त बेरोजगारी है। परंतु यह इस समस्या का एकमात्र कारण निश्चित रूप से नहीं है। बल्कि इसका एक बडा कारण यह भी हो सकता है कि हमारे शिक्षित युवा उच्च पदों पर स्थान प्राप्त करने के काबिल नहीं हैं। हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए।

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आज हम जो स्थिति देखते हैं उसमें यह प्रतीत होता है कि (संपूर्ण विश्व में) शिक्षा व्यवस्था उद्योग-व्यवसाय की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित नहीं हो रही है। अधिकांश महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अर्जित ज्ञान उद्योग व्यवसाय उन्मुख नहीं है। हमारे पाठ्यक्रमों में उद्योग-व्यवसाय की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तन नहीं किये जा रहे हैं अतः उसीधे रोजगार क्षमता चुनौती बनी हुई है।   इसके कारण हमारे युवाओं में भारी निराशा और अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो रही है। यह खतरनाक है। इनमें से अधिकांश तीन मूलभूत आर - रीडिंग - राइटिंग अरिथमैटिक - में भी श्रेष्ठता प्राप्त करने में अक्षम हैं

देश की शिक्षा नीति देश की शिक्षा नीति इन उभरती चुनौतियों के इर्द-गिर्द विकसित होना चाहिए। शिक्षा को व्यापार विश्व की तेजी से बदलती आवश्यकताओं की दृष्टि से सार्थक, उपयोगी और संतोषजनक बनाने के लिए अथक प्रयासों की आवश्यकता है। एक प्रणाली जो औद्योगिक दुनिया की सीधी-रेखानुसार और पूर्वकथनीय धुएं-की-चिमनी (स्मोकेस्टेक) अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल थी,  तेजी से चरमराती जा रही है, और कोई नई व्यवस्था उसका स्थान लेने के लिए मौजूद नहीं है।


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Hindi Bodhi Booster: भारत में साक्षरता और शिक्षा व्यवस्था
भारत में साक्षरता और शिक्षा व्यवस्था
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