हॉकी : हमारा राष्ट्रीय खेल?

खेल-कूद को आधुनिक भारत में हमेशा से ही काफी कम महत्त्व दिया गया है, या हम यह कहें कि एक राष्ट्र के रूप में हमनें कभी खेलों में उत्कृष्टता...

खेल-कूद को आधुनिक भारत में हमेशा से ही काफी कम महत्त्व दिया गया है, या हम यह कहें कि एक राष्ट्र के रूप में हमनें कभी खेलों में उत्कृष्टता को गंभीरता से लिया ही नहीं है। ऐसा देखा गया है कि विभिन्न देश कम से कम अपने राष्ट्रीय खेलों के प्रति जुनूनी होते हैं और उन्हें विकसित करते हैं, परंतु हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी के विषय में ऐसा नहीं हुआ। वास्तविकता तो यह है कि जिस खेल को अब तक हम अपना राष्ट्रीय खेल मानते आ रहे थे, वह हमारा राष्ट्रीय खेल है ही नहीं, जैसा कि सूचना के अधिकार (RTI) के अंतर्गत पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में खुलासा हुआ है ! [बाद में बोधि कडी देखें]


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इस संभ्रम को एक ओर रखें।  यह बोधि केवल हॉकी के संबंध में नहीं है, यह उस जूनून और प्रेम के संबंध में है जो हम खेलों के प्रति प्रदर्शित करते हैं।  आज भारत के लोग केवल एक खेल के प्रति जुनूनी है, वह है क्रिकेट। क्या हम में से किसी ने हमारे अजीतपाल सिंह, अशोक कुमार, धनराज पिल्लई या अन्य अनेक स्तरीय हॉकी खिलाडियों के प्रति प्रशंसकों के वैसे जूनून के बारे में सुना है जैसा हम सचिन तेंडुलकर, महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के प्रति देखते हैं? यहाँ प्रतिभा के लिए कोई स्थान नहीं है, स्थान केवल इस बात का है कि आप उस प्रतिभा को सही खेल में प्रदर्शित करते हैं, यही वास्तविकता है।

एक समय था जब अंतरराष्ट्रीय हॉकी में भारत ही इकलौता नाम था। विपक्षी टीमें भारत से मुकाबला करने में कतराती थीं क्योंकि वे जानते थे कि पराजय निश्चित थी। मेजर ध्यानचंद, कैप्टेन रूप सिंह जैसे खिलाडी एक बार गेंद मिलने के बाद उसे तब तक नहीं छोडते थे जब तक कि वह गोल की जाली में नहीं पहुँच जाती थी। वे वास्तव में हॉकी के जादूगर थे। उन्होंने भारत के ध्वज को हमेशा ऊंचा रखा। उसके बाद इस प्रकार की उत्कृष्टता कभी देखी नहीं गई।

केवल एक ही खेल पर अपनी सारी शक्ति को केंद्रित करना वास्तव में हमारे राष्ट्रीय चरित्र की अन्य  अनेक कमजोरियों का प्रतिबिंबन है। हमने धन को यह अनुमति प्रदान की है कि उत्कृष्टता कहाँ निर्मित होगी। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना ही हमारा लक्ष्य होता है - जीतना हमारी कार्यसूची में नहीं है। केवल हॉकी में ही नहीं बल्कि अन्य खेलों में भी हमनें स्वयं को इस स्तर पर ला दिया है कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं में हिस्सा लेने की पात्रता हासिल करने के लिए हमें पात्रता मुकाबले खेलने पडते हैं ! आज हम ओलिंपिक खेलों में हिस्सा लेने की पात्रता प्राप्त करने पर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं, जहाँ एक समय हम निर्विवाद रूप से शीर्ष पर थे।

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क्या हमें  सभी खेलों  की आज की इस दयनीय अवस्था के लिए स्वयं को जिम्मेदार नहीं मानना चाहिए? जहाँ तक प्रतिभा का प्रश्न है, देश में हॉकी प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस खेल का दिल से समर्थन करके खिलाडियों को प्रोत्साहित करें ताकि उनमे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का उत्साह पैदा हो। यह विश्व में हमारी नर्म शक्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

बीते कुछ समय में इस दिशा में कुछ प्रयास किये जा रहे हैं। इंडियन हॉकी लीग जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं जहाँ निजी क्षेत्र विभिन्न टीमों को प्रायोजित कर रहा है और उन्हें आवश्यक अंतरराष्ट्रीय अनावरण प्रदान करने का प्रयास कर रहा है ताकि हॉकी को उसकी पुरानी प्रतिष्ठा प्राप्त हो सके।  आने वाले समय में हम इस कहानी को और विकसित करेंगे, तब तक इंतजार कीजिये!

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